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IAS Tukaram Mundhe News : मां की अस्थियां नदी में नहीं बहाईं, तेरहवीं और भोज पर भी लगाई रोक

अपनी ईमानदारी और सख्त तेवरों के लिए मशहूर महाराष्ट्र कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे (IAS Tukaram Mundhe News) एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह उनका तबादला नहीं, बल्कि उनकी वो प्रगतिशील सोच है जिसने सदियों पुरानी परंपराओं को चुनौती दी है।

हाल ही में अपनी मां के निधन के बाद, मुंढे ने रूढ़िवादी कर्मकांडों को दरकिनार करते हुए एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी हर तरफ सराहना हो रही है। उन्होंने मां की अस्थियों को पवित्र नदियों में विसर्जित करने के बजाय उन्हें मिट्टी में समाहित कर एक नया जीवन (पौधा) देने का निर्णय लिया।

अस्थि विसर्जन नहीं, किया वृक्षारोपण (IAS Tukaram Mundhe News)

आमतौर पर हिंदू परंपरा के अनुसार, मृत्यु के बाद अस्थियों को नदी के पवित्र जल में विसर्जित किया जाता है, लेकिन आईएएस तुकाराम मुंढे और उनके भाई अशोक मुंढे ने इस लीक से हटकर काम किया।

उन्होंने अपनी माता आसराबाई मुंढे की अस्थियों को पानी में बहाने के बजाय अपने घर के आंगन में एक बरगद का पेड़ लगाया और अस्थियों को उसी की जड़ों में अर्पित कर दिया। उनका मानना है कि मां की यादें इस वृक्ष के रूप में हमेशा उनके सामने जीवित रहेंगी और यह पर्यावरण के संरक्षण में भी एक छोटा सा योगदान होगा।

दसवां, तेरहवीं और मृत्यु भोज का बहिष्कार

सिर्फ अस्थि विसर्जन ही नहीं, तुकाराम मुंढे ने समाज में व्याप्त खर्चीली और पारंपरिक प्रथाओं पर भी कड़ा प्रहार (IAS Tukaram Mundhe News) किया है। उन्होंने ऐलान किया है कि उनकी मां के निधन के बाद कोई भी पारंपरिक कर्मकांड जैसे दसवां, तेरहवीं या मृत्यु भोज का आयोजन नहीं किया जाएगा।

अक्सर इन रस्मों के नाम पर होने वाले फिजूलखर्च और सामाजिक दबाव के खिलाफ मुंढे का यह फैसला एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। सोशल मीडिया पर लोग उनके इस कदम को ‘पाखंड मुक्त समाज’ की दिशा में एक साहसी पहल बता रहे हैं।

कौन हैं महाराष्ट्र के ‘अशोक खेमका’ कहे जाने वाले मुंढे?

तुकाराम मुंढे महाराष्ट्र के बीड जिले के एक साधारण किसान परिवार से आते हैं, जिन्होंने अपने संघर्ष के दम पर 2005 में यूपीएससी की परीक्षा (IAS Tukaram Mundhe News) पास की। अपने 21 साल के प्रशासनिक करियर में 24 बार तबादला झेलने वाले मुंढे को भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जीरो टॉलरेंस नीति के कारण जाना जाता है।

उनकी कार्यशैली के कारण लोग उन्हें महाराष्ट्र का ‘अशोक खेमका’ भी कहते हैं। जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके शानदार कार्यों की वजह से उन्हें ‘वाटरमैन’ की उपाधि भी दी गई है।

एक अधिकारी जो अपनी शर्तों पर जीता है

मुंढे का जीवन हमेशा से संघर्षपूर्ण और सिद्धांतों पर आधारित रहा है। अपनी मां के अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्मों में बदलाव कर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे केवल फाइलों में ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी समाज को नई दिशा दिखाने का माद्दा रखते हैं। उनके इस फैसले की चर्चा अब पूरे महाराष्ट्र में हो रही है और लोग इसे एक ‘प्रबुद्ध नागरिक’ की असली पहचान मान रहे हैं।

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