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High Court News: सहायक प्राध्यापक की बर्खास्तगी रद्द, दो दशक बाद मिली थी सरकारी नौकरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब दो दशक पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी सत्यापन प्रपत्र में नहीं देने के मामले में सहायक प्राध्यापक को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग द्वारा 17 फरवरी 2025 को जारी सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, सेवा से बाहर रहने की अवधि का बकाया वेतन देने से कोर्ट ने इनकार किया है। याचिकाकर्ता को वरिष्ठता के लिए सेवा की निरंतरता का लाभ मिलेगा।  न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु ने याचिका स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा विभाग के 17 फरवरी 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया और हीरा प्रसाद यादव को तत्काल सेवा में बहाल करने का आदेश दिया। उन्हें वरिष्ठता के लिए सेवा की निरंतरता मिलेगी, लेकिन बीच की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा।

 मामला अंबिकापुर के शासकीय राजमोहिनी देवी कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में पदस्थ सहायक प्राध्यापक (वाणिज्य) हीरा प्रसाद यादव से जुड़ा है। उन्हें वर्ष 2018 में नियुक्ति मिली थी और उन्होंने 10 अक्टूबर 2018 को सेवा ज्वाइन की थी। नियुक्ति के दौरान चरित्र सत्यापन प्रपत्र में उन्होंने वर्ष 1994 में दर्ज दो आपराधिक मामलों की जानकारी नहीं दी थी। विभाग ने इसी आधार पर उनकी सेवा समाप्त कर दी थी। 

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि का सत्यापन करना नियोक्ता का अधिकार है, लेकिन जानकारी छिपाने के आधार पर सेवा समाप्ति स्वत: नहीं हो सकती। मामले में कर्मचारी की उम्र, अपराधों की प्रकृति और पुरानापन, बरी होने के आदेश, नियुक्ति से पहले बीते लंबे समय, शैक्षणिक योग्यता, सेवा का रिकॉर्ड और बाद में दी गई सफाई जैसे सभी पहलुओं पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार किया जाना जरूरी है। 

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि दोनों मामले उस समय दर्ज हुए थे, जब उनकी उम्र करीब 17 वर्ष थी और वे कक्षा 11वीं में पढ़ रहे थे। एक मामले में 13 नवंबर 1995 और दूसरे मामले में 11 दिसंबर 1997 को उन्हें बरी कर दिया गया था। इसके बाद उनके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला सामने नहीं आया। उन्होंने आगे उच्च शिक्षा हासिल करते हुए एमकॉम, एमफिल और पीएचडी की डिग्रियां प्राप्त कीं और नियमित चयन प्रक्रिया के जरिए सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। 

 राज्य सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने केवल सत्यापन प्रपत्र में ही नहीं, बल्कि वर्ष 2018 में दिए गए शपथपत्र में भी आपराधिक मामलों की जानकारी नहीं दी थी। बाद में वर्ष 2021 में जानकारी देने से पहले की जानकारी छिपाने की गलती समाप्त नहीं हो जाती। कोर्ट ने पाया कि सेवा समाप्ति के आदेश में इन परिस्थितियों का समग्र रूप से विचार नहीं किया गया। सिर्फ जानकारी नहीं देने के आधार पर कर्मचारी को सरकारी सेवा के लिए अनुपयुक्त मान लिया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने की कार्रवाई मनमाने या यांत्रिक तरीके से नहीं की जा सकती, बल्कि प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर उचित और तर्कसंगत निर्णय लेना होगा। 

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