High Court Chhattisgarh : एक टिप्पणी पर अटकी थी पदोन्नति, ACR विवाद पर हाई कोर्ट सख्त, प्रमोशन का दिया सीधा आदेश

High Court Chhattisgarh

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कई साल की मेहनत, परीक्षा में बेहतर अंक और फिर भी पदोन्नति से वंचित रहना – यही सवाल एक कर्मचारी के मन में लगातार उठता रहा। एक कागजी टिप्पणी ने उसकी राह रोक (High Court Chhattisgarh) दी थी, लेकिन जब मामला न्यायालय पहुंचा, तो नियमों की कसौटी पर उस टिप्पणी की असलियत सामने आ गई।

यह मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, बिलासपुर से जुड़ा है, जहां आबकारी विभाग में मुख्य आरक्षक के पद पर पदस्थ गौरेला निवासी मुकेश शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने अहम आदेश पारित किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना सुनवाई का अवसर दिए किसी भी कर्मचारी के ACR में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं की जा सकती, और इसी आधार पर याचिकाकर्ता को आबकारी सब-इन्सपेक्टर पद पर प्रमोशन देने के निर्देश दिए गए हैं।

जानकारी के अनुसार, मुकेश शर्मा को उनके ACR में की गई प्रतिकूल टिप्पणी के कारण उपनिरीक्षक पद पर पदोन्नति से वंचित कर दिया गया था। इससे आहत होकर उन्होंने अपने अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और वर्षा शर्मा के माध्यम से हाई कोर्ट में रिट याचिका (High Court Chhattisgarh) दायर की। याचिका में यह प्रमुख रूप से कहा गया कि ACR में नकारात्मक टिप्पणी से पहले उन्हें न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि यदि किसी शासकीय कर्मचारी को निर्धारित समयावधि में कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया, तो ACR में की गई प्रतिकूल टिप्पणी स्वतः प्रभावहीन मानी जाएगी। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि विभागीय भर्ती परीक्षा में याचिकाकर्ता को 200 में से 172 अंक प्राप्त हुए थे।

रिकॉर्ड के अनुसार, अनारक्षित वर्ग के अंतिम चयनित उम्मीदवारों को 175 और 177 अंक मिले थे। ऐसे में यदि ACR के आधार पर रोके गए अंक जोड़े (High Court Chhattisgarh) जाते हैं, तो याचिकाकर्ता स्पष्ट रूप से उपनिरीक्षक पद पर पदोन्नति का पात्र बनता है। इसी तथ्य को आधार बनाते हुए अदालत ने मामले को गंभीरता से परखा।

उच्च न्यायालय ने सभी तथ्यों, सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांतों और वर्ष 2005 में जारी राज्य शासन के सर्कुलर को ध्यान में रखते हुए यह माना कि याचिकाकर्ता के साथ प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने विभाग को निर्देशित किया कि नियमानुसार कार्रवाई करते हुए मुकेश शर्मा को आबकारी उपनिरीक्षक के पद पर प्रमोशन प्रदान किया जाए।

यह फैसला न केवल संबंधित कर्मचारी के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि उन सभी शासकीय कर्मचारियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि सेवा अभिलेखों में किसी भी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी से पहले न्यायिक प्रक्रिया और सुनवाई का अधिकार अनिवार्य है।