झारखण्ड

Hemant Soren : क्या 18 सीटों पर दांव लगाकर ‘किंगमेकर’ बनेंगे हेमंत सोरेन?

असम विधानसभा चुनाव का प्रचार अभियान खत्म होने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन वापस रांची (Hemant Soren) लौट आए हैं। 10 दिनों तक असम की गलियों और चाय बागानों में पसीना बहाने के बाद झामुमो (JMM) खेमे में एक अलग ही उत्साह देखने को मिल रहा है। हेमंत सोरेन का दावा है कि इस बार असम की सत्ता की चाबी उनके हाथ में हो सकती है।

चाय बागानों में ‘झारखंडी’ जज्बात का दांव (Hemant Soren)

असम की 126 सीटों में से झामुमो ने इस बार 18 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। कहने को तो यह संख्या कम है, लेकिन ये सभी सीटें ‘टी-ट्राइब्स’ बहुल इलाकों में हैं। इन मजदूरों का गहरा नाता झारखंड की मिट्टी से है। हेमंत सोरेन ने अपनी हर रैली में इसी भावनात्मक रिश्ते को उभारा। उन्होंने साफ कहा कि चाय बागान मजदूरों को उनका हक और अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाना ही उनकी पार्टी की प्राथमिकता है।

विरोध और बाधाओं ने बढ़ाई सियासी तपिश

चुनाव प्रचार के दौरान हेमंत सोरेन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। झामुमो नेताओं ने आरोप लगाया कि जानबूझकर उनके हेलीकॉप्टर को रोका (Hemant Soren) गया और कई जगहों पर जनसभाओं की अनुमति नहीं दी गई। हेमंत सोरेन ने इसे अपनी ताकत के रूप में पेश किया और जनता से कहा कि उनकी बढ़ती लोकप्रियता से विपक्षी घबरा गए हैं। इन विवादों ने झामुमो को चुनाव के केंद्र में ला खड़ा किया है।

किंगमेकर की भूमिका में झामुमो?

रांची पहुंचने पर हेमंत सोरेन ने मीडिया से संक्षिप्त बातचीत में कहा कि वे जनता की अदालत में अपना पक्ष रख चुके हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि झामुमो इन 18 में से 8 से 10 सीटें भी जीतने में कामयाब रहती है, तो त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में हेमंत सोरेन के समर्थन के बिना सरकार बनाना मुश्किल होगा। यही वह समीकरण है जो झामुमो को इस बार ‘किंगमेकर’ की रेस में सबसे आगे रख रहा है।

राष्ट्रीय क्षितिज पर हेमंत सोरेन का बढ़ता कद

असम का यह दौरा केवल सीटों के लिए नहीं था, बल्कि हेमंत सोरेन को एक बड़े आदिवासी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश (Hemant Soren) भी थी। झारखंड से निकलकर पूर्वोत्तर के राज्यों में अपनी सक्रियता दिखाकर उन्होंने यह संदेश दे दिया है कि झामुमो अब केवल एक राज्य तक सीमित रहने वाली पार्टी नहीं है। आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि हेमंत सोरेन का यह ‘मिशन असम’ उनकी नेशनल पॉलिटिक्स की राह कितनी आसान बनाता है।

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