Hasdeo Bachao Andolan: 15 वर्षों से जारी है जल, जंगल और आदिवासियों के अस्तित्व की लड़ाई

अंबिकापुर/नवप्रदेश। छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य एक बार फिर कोयला खनन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। Hasdeo Bachao Andolan के तहत जंगल, जल, वन्यजीव और आदिवासी अस्तित्व की लड़ाई पिछले 15 वर्षों से आज भी जारी है। एक के बदले 10 पेड़ लगाने का दावा खोखला साबित हुआ है और लाखों पेड़ों की बलि दी जा चुकी है।

हसदेव अरण्य: मध्य भारत का अखंडित जंगल और जैव विविधता, Hasdeo Bachao Andolan

लगभग 3,000 वर्ग किलोमीटर में फैला यह वन क्षेत्र मध्य भारत के सबसे बड़े अखंडित जंगलों में गिना जाता है। यहां 82 से अधिक पक्षी प्रजातियां, दुर्लभ वनस्पतियां, तितलियां तथा हाथियों का प्रमुख प्रवासी गलियारा मौजूद है।

साथ ही गोंड, उरांव, लोहार सहित कई आदिवासी समुदायों के लगभग 10 हजार लोग अपनी आजीविका, संस्कृति और परंपराओं के लिए इन जंगलों पर निर्भर हैं, मगर अब इसके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। (Hasdeo Bachao Andolan) आंदोलनकारी जंगलों की कटाई रोकने और नए कोयला ब्लॉकों के आवंटन का विरोध कर रहे हैं।

परसा कोल ब्लॉक और खनन का दुष्प्रभाव

जानकारी के अनुसार, पहले चरण में परसा कोल ब्लाक के 1252 हेक्टेयर क्षेत्र से कोयला खनन की अनुमति दी गई थी। इसमें 841 हेक्टेयर जंगल की ज़मीन, 365 हेक्टेयर कृषि ग्रामीण क्षेत्र और 5 हेक्टेयर ज़मीन सरकारी थी। इस ब्लॉक में खनन की निर्धारित समय सीमा साल 2027 थी, जहां 5 साल पहले ही (साल 2022 में) कोल खनन कर लिया गया है।

पीईकेबी खदान के प्रथम चरण में लगभग 841 हेक्टेयर वन क्षेत्र साफ किया गया। वहीं कई चरणों में लगातार हजारों हेक्टेयर में लाखों पेड़ों की कटाई आज भी जारी है।

हाथियों का प्राकृतिक मार्ग प्रभावित, Hasdeo Bachao Andolan

हसदेव बचाओ संघर्ष समिति के अखिलेश पोर्ते का कहना है कि खनन के कारण हाथियों के प्राकृतिक मार्ग प्रभावित हुए, मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा, भूजल स्तर में गिरावट आई तथा विस्फोटक खनन गतिविधियों से गांवों और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जंगलों के समाप्त होने से स्थानीय लोगों की आजीविका, पारंपरिक संस्कृति और जैव विविधता पर गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा।

हसदेव क्षेत्र (Hasdeo Bachao Andolan) में कुल दर्जन भर से अधिक कोयला ब्लॉक चिन्हित किए गए हैं, जिनमें से कई का आवंटन विभिन्न सरकारी एवं निजी कंपनियों को किया जा चुका है। प्रभावित ग्राम घटबर्रा निवासी अखिलेश पोर्ते का कहना है कि यदि इन सभी ब्लॉकों में खनन शुरू हुआ, तो हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा और बड़ी संख्या में ग्रामीणों का विस्थापन होगा।

नियमों को दरकिनार कर बड़े पैमाने पर खनन से पर्यावरणीय नुकसान

2011 में जब खनन शुरू हुआ, तो ग्रामीणों को तुरंत ही इसके अनुमानित नकारात्मक प्रभावों का सामना करना पड़ा। खनन से स्थानीय हाथियों और उनके प्रवास मार्गों में व्यवधान उत्पन्न हुआ, जिसके चलते खेतों में हिंसक हाथियों की संख्या बढ़ने लगी और मनुष्यों व हाथियों की मौतें भी बढ़ गईं।

15 वर्षों से लगातार जारी है हसदेव बचाओ आंदोलन

वर्ष 2010 में पारसा ईस्ट एवं केटे बासन (पीईकेबी) कोयला परियोजना के लिए लगभग 1,900 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग को मंजूरी मिलने के बाद क्षेत्र में खनन गतिविधियां शुरू हुईं। इसके बाद से स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने Hasdeo Bachao Andolan की शुरुआत की, जो पिछले 15 वर्षों से लगातार जारी है।

आंदोलन के दौरान कई बार पदयात्राएं, धरना-प्रदर्शन, कैंडल मार्च, भूख हड़ताल और जनसभाएं आयोजित की गईं।

घटबर्रा के ग्रामीण अमीन साय का कहना है कि प्रथम चरण में खदान के शुरू करने से पहले प्रबंधन द्वारा 1 पेड़ के बदले 10 पेड़ काटने का दावा करते हुए हजारों पेड़ काटे गए, मगर प्रबंधन द्वारा महज गिनती के पौधे रोपकर औपचारिकता निभा दी गईं। इससे पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ है, मगर फिर भी प्रशासन द्वारा न कोई कार्रवाई की जा रही है और न ही प्रबंधन द्वारा पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लोगों को वन अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण संबंधी कानूनों के प्रति जागरूक करने का अभियान भी लगातार चलाया जा रहा है। इस आंदोलन को देशभर के कई सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों का समर्थन भी मिला है।

हाल के वर्षों में जनविरोध और पर्यावरणीय चिंताओं को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र सरकार से हसदेव क्षेत्र के कुछ नए कोयला ब्लॉकों की नीलामी पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। Hasdeo Bachao Andolan अब केवल एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन, आदिवासी अधिकारों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ी राष्ट्रीय बहस का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है।

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