संपादकीय

सम्मान के नाम पर सियासत

स्वतंत्राता संग्राम सेनानी वीर सावरकर के नाम पर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने एक बार फिर महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की गठबंधन सरकार बनने पर वीर सावरकर को भारत रत्न सम्मान देने की अनुशंसा करने की बात की है। भाजपा की इस घोषणा का शिवसेना ने भी समर्थन किया है।

इसके बाद से देश के सर्वोच्च सम्मान को लेकर पक्ष और विपक्ष में खींच-तान मच गई है। कांग्रेस पार्टी ने वीर सावरकर को भारत रत्न सम्मान दिए जाने की अनुशंसा का विरोध किया है। कांग्रेस का आरोप है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए नाथूराम गोड़से को सजा मिली थी। वह वीर सावरकार के ही सहयोगी थे और गांधी हत्याकांड में वीर सावरकर भी आरोपी थे। भले ही वे न्यायालय से बरी हो गए थे।

कांग्रेस ने तो यहां तक तल्ख टिप्पणी कर दी है कि सावरकर ही क्यों नाथूराम गोड़से को भी भाजपा भारत रत्न सम्मान दे सकती है। कांग्रेस के इन आरोपों का जवाब देते हुए खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर सच्चे राष्ट्र भक्त थे। जहां तक वीर सावरकर के नाम पर हो रही सियासत का सवाल है तो यही कहना होगा कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने ऐन विधानसभा चुनाव के पूर्व वीर सावरकर को भारत रत्न सम्मान देने की सिफरिश करने की बात कर के इस मामले को सियासत का मुद्दा बना दिया है।

इसमें कोई शक नहीं कि वीर सावरकर सच्चे राष्ट्र भक्त थे जिन्हे अंग्रेजों ने काला पानी की सजा दी थी। स्वतंत्रा संग्राम में वीर सावरकर की अग्रणी भुमिका रही है। उन्हे यथोचित सम्मान मिलना चाहिए किन्तु ऐन विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसी बात कर के भाजपा ने इसे राजनीति का मुद्दा बना दिया है। पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर कांग्रेस का रूख साफ करते हुए कहा है कि उन्हें वीर सावरकर के नाम पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन वे जिस विचार धारा का समर्थन करते थे उसपर कांग्रेस को आपत्ति है।

वीर सावरकर के नाम पर पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने डाक टिकट जारी किया था। जब कांग्रेस स्वयं वीर सावरकर की स्मृति में डाक टिकट जारी कर सकती है तो उसे वीर सावरकर को भारत रत्न सम्मान देने पर क्या आपत्ति हो सकती है। बेेहतर होगा कि देश के सर्वोच्च सम्माने को लेकर सियासत न की जाएं।

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