Election Commission Response : वोटर लिस्ट से नाम हटे, वजह अब भी साफ नहीं… सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा हिसाब

Election Commission Response

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मतदाता सूची से नाम हटने की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवाल अब सीधे देश की सर्वोच्च अदालत (Election Commission Response) तक पहुंच गए हैं। कागज़ों में दी जा रही वजहों और ज़मीनी हकीकत के बीच क्या फर्क है—यही जानना अब अदालत की प्राथमिकता बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चुनाव आयोग से कड़ा सवाल करते हुए पूछा है कि क्या ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर भी वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए (Election Commission Response) गए हैं, और अगर ऐसा हुआ है तो इसकी संख्या कितनी है। अदालत ने साफ किया कि अब तक सामने आई जानकारी इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं देती।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव आयोग वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए अब तक केवल तीन कारण—मृत्यु, डुप्लीकेशन और माइग्रेशन—बताता रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि क्या ‘संदिग्ध नागरिकता’ कोई अलग श्रेणी है या नहीं।

कागज़ी जवाब नहीं, ज़मीनी सच्चाई चाहिए

अदालत ने चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता से कहा कि वह केवल औपचारिक उत्तर नहीं चाहती, बल्कि यह समझना चाहती है कि वास्तव में नाम हटाने की प्रक्रिया कैसे अपनाई (Election Commission Response) गई। पीठ ने पूछा—क्या शक के आधार पर भी किसी का नाम हटाया गया? इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि इस बिंदु पर विस्तृत जानकारी लेकर अदालत को अवगत कराया जाएगा।

नागरिकता तय करने का अधिकार किसका?

सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि नागरिकता तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है। चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि आयोग का दायरा केवल मतदाता पंजीकरण तक सीमित है। वह यह तय नहीं करता कि कोई व्यक्ति देश में रहने का पात्र है या नहीं, बल्कि सिर्फ यह देखता है कि वह वोटर बनने की योग्यता रखता है या नहीं।

प्रभावित वोटरों को मौका देने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि केरल में SIR प्रक्रिया के बाद जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी जानकारी सार्वजनिक की जाए। अदालत का कहना था कि जिनका नाम हटाया (Election Commission Response) गया है, उन्हें आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। साथ ही आपत्ति की समय-सीमा को दो सप्ताह बढ़ाने पर भी गंभीरता से विचार करने को कहा गया है।

फिलहाल अदालत इस पूरे मामले में चुनाव आयोग के विस्तृत जवाब का इंतजार कर रही है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि आयोग क्या यह स्पष्ट कर पाएगा कि नाम हटाने में ‘संदिग्ध नागरिकता’ का कोई आधार अपनाया गया या नहीं।