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Elderly Neglect India : खंडहर के अंधेरे में दम तोड़ती जिंदगी – चूहों के बीच कैद बुजुर्ग और हारती हुई इंसानियत

यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस समाज पर कठोर सवाल है, जो जिंदा इंसान को मरते देखने का आदी होता (Elderly Neglect India) जा रहा है। अंबाला के एक खंडहरनुमा मकान में मंगलवार को जो दृश्य सामने आया, उसने रिश्तों, व्यवस्था और संवेदनाओं – तीनों को बेनकाब कर दिया। 65 वर्षीय हरि किशन बीते करीब छह महीनों से अपने ही घर के एक कमरे में कैद थे। वह जीवित थे, लेकिन हालात ऐसे थे कि जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा कब की मिट चुकी थी।

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अंधेरे कमरे में बदबू, गंदगी और सन्नाटे के बीच हरि किशन पड़े थे। शरीर पर कीड़े रेंग रहे थे, चूहे उनके हाथ-पैरों की उंगलियां कुतर चुके थे। ठंडा पड़ता शरीर, लड़खड़ाती सांसें और आंखों में जमी असहायता – सब कुछ यह बता रहा था कि यह मौत अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आई हुई पीड़ा का नतीजा है। बोलने की ताकत लगभग खत्म हो चुकी थी, लेकिन दर्द हर सांस के साथ चीख बनकर उभर रहा था।

सोमवार रात हितेष नाम के एक युवक को जब बुजुर्ग की स्थिति का अंदाजा हुआ, तो उसने देर नहीं की। घर में खिचड़ी बनाई और अपने हाथों से हरि किशन को खिलाया। इसके बाद स्वयंसेवी संगठन को सूचना (Elderly Neglect India) दी गई। मंगलवार दोपहर करीब साढ़े तीन बजे पहुंची टीम जब कमरे में दाखिल हुई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। दो कंबलों में लपेटकर बुजुर्ग को एंबुलेंस से जिला नागरिक अस्पताल ले जाया गया।

अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष

जिला नागरिक अस्पताल में हरि किशन की हालत नाजुक बनी हुई है। उन्हें ग्लूकोज चढ़ाया गया है, ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया है। ईसीजी रिपोर्ट सामान्य बताई जा रही है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार शरीर पूरी तरह टूट चुका है। कुपोषण, संक्रमण और लंबे समय तक देखभाल के अभाव ने स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया है। डॉक्टरों का कहना है कि सांसें कभी भी जवाब दे सकती हैं।

इस त्रासदी की जड़ें कोरोना काल में छिपी हैं। महामारी ने हरि किशन से एक-एक कर सब कुछ छीन लिया—पहले पत्नी, फिर बेटा और बेटी। पूरा परिवार खत्म (Elderly Neglect India) हो गया। शुरू में वे कभी-कभार घर से बाहर निकलते थे, बैंक जाकर पेंशन ले आते थे, लेकिन अपनों के जाने का सदमा इतना गहरा था कि उन्होंने खुद को दुनिया से काट लिया।

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धीरे-धीरे हालात बिगड़ते गए। दरवाजा बंद रहा, कमरा ही उनकी दुनिया बन गया। वहीं खाना, वहीं मल-मूत्र, वहीं जीवन। महीनों से नहाने की बात तो दूर, साफ पानी तक नसीब नहीं हुआ। भूख से मर न जाएं, इसलिए कुछ पड़ोसी तरस खाकर दरवाजे के बाहर रोटी रख जाते थे। वही सूखी रोटियां उनकी जिंदगी की आखिरी डोर बनी रहीं। लेकिन जब घर से तेज बदबू आने लगी और बीमारी फैलने का डर सताने लगा, तो वह सहारा भी खत्म हो गया।

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