ED Evidence Controversy : केजरीवाल को राहत के बाद झारखंड में सियासी घमासान, JMM ने ED के ‘ब्रह्मास्त्र’ पर उठाए सवाल
ED Evidence Controversy
दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल को अदालत से राहत मिलने के बाद झारखंड की सियासत भी गर्म हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने प्रवर्तन निदेशालय पर तीखा हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ पेश किए गए सबूतों को “राजनीतिक नैरेटिव” का हिस्सा बताया है।
पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से जारी बयान में दावा किया गया कि ED ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जिन दस्तावेजों को अहम सबूत बताया, वे मात्र एक टीवी और एक फ्रिज (ED Evidence Controversy) के बिल हैं, जिनकी कुल कीमत लगभग 29 हजार रुपये है। JMM ने इसे व्यंग्यात्मक रूप से “ब्रह्मास्त्र” कहा और आरोप लगाया कि ऐसे मामूली दस्तावेजों के आधार पर महीनों तक मीडिया ट्रायल चलाया गया।
क्या हैं विवादित बिल?
JMM द्वारा साझा किए गए दस्तावेजों में दो इनवॉयस दिखाए गए हैं—
एक, 19 फरवरी 2017 का, रांची स्थित एक एजेंसी से जारी टीवी का बिल (लगभग ₹15,200)।
दूसरा, नवंबर 2022 का शाओमी स्मार्ट टीवी का बिल (लगभग ₹14,000)।
दोनों दस्तावेजों पर PMLA, 2002 की धारा 50 के तहत जानकारी प्रदान किए जाने का उल्लेख बताया गया है। पार्टी का आरोप है कि इन्हीं दस्तावेजों को आधार बनाकर राजनीतिक कहानी गढ़ी गई।
जमीन घोटाले का आरोप और कानूनी लड़ाई
हेमंत सोरेन पर कथित रूप से 8.86 एकड़ जमीन अवैध तरीके से हासिल करने (ED Evidence Controversy) का आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) का दावा है कि संबंधित जमीन से जुड़े परिवार के नाम पर खरीदे गए सामान जांच में अहम कड़ी हैं।
सोरेन को जनवरी 2024 में गिरफ्तार किया गया था और जून 2024 में उन्हें जमानत मिली। हाल ही में 25 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ED की समन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाते हुए एजेंसी को नोटिस जारी किया है।
केजरीवाल फैसले के बाद नई बहस
27 फरवरी को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित अन्य आरोपियों को बरी/डिस्चार्ज कर दिया। अदालत ने जांच को “स्पेकुलेटिव” बताते हुए व्यापक आपराधिक साजिश के आरोपों को पर्याप्त आधारहीन माना।
इस फैसले के बाद विपक्षी दलों ने केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा फिर जोरशोर से उठाया है। JMM और आम आदमी पार्टी का कहना है कि जांच एजेंसियों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एजेंसियां स्वतंत्र हैं और अंतिम निर्णय अदालतें ही करती हैं।
सियासत बनाम जांच
झारखंड और दिल्ली की इन घटनाओं ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भ्रष्टाचार की जांच और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच की रेखा धुंधली (ED Evidence Controversy) हो रही है। एक ओर एजेंसियां कानूनी प्रक्रिया का हवाला दे रही हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे लोकतांत्रिक जनादेश पर प्रहार बता रहा है।
आने वाले दिनों में उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि इन मामलों का कानूनी निष्कर्ष किस दिशा में जाता है, लेकिन फिलहाल राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है।
