Dhan Dhaanya Yojana Organic Farming : धन धान्य योजना से बदली खेती की तस्वीर
Dhan Dhaanya Yojana Organic Farming
छत्तीसगढ़ शासन और जिला प्रशासन दंतेवाड़ा द्वारा संचालित धन धान्य योजना अब जिले में खेती की पारंपरिक सोच को बदलने का माध्यम बनती जा रही है। रासायनिक खेती से हटकर जैविक और विषमुक्त उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का असर अब ज़मीनी स्तर पर दिखने लगा है।
धन धान्य योजना (Dhan Dhaanya Yojana Organic Farming) के अंतर्गत कुआकोंडा विकासखंड के ग्राम हितावर के किसान संजय ने पूरी तरह जैविक पद्धति से मक्का उत्पादन कर एक नई मिसाल कायम की है।
किसान संजय लंबे समय से रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से मिट्टी की गिरती उर्वरता और बढ़ती लागत से परेशान थे। खेत की उत्पादक क्षमता कम होती जा रही थी और फसल पर खर्च लगातार बढ़ रहा था।
इसी बीच कृषि विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने विषमुक्त खेती (Dhan Dhaanya Yojana Organic Farming) अपनाने का निर्णय लिया। कृषि विभाग के मैदानी अमले ने उन्हें जैविक खेती की तकनीक, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और मिट्टी की सेहत सुधारने के उपायों की विस्तृत जानकारी दी।
मार्गदर्शन के अनुसार संजय ने खेत की तैयारी में गोबर की खाद और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया। बीज उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा और बीजामृत अपनाया गया, जबकि फसल पोषण के लिए जीवामृत और घनजीवामृत जैसे जैविक घोलों का नियमित छिड़काव किया गया।
रासायनिक खादों का पूरी तरह त्याग करने के बावजूद मक्का की फसल में किसी प्रकार की पोषक तत्वों की कमी नहीं आई। इसके उलट फसल अधिक हरी-भरी, स्वस्थ और आकर्षक नजर आई, जिससे जैविक खेती मॉडल (Dhan Dhaanya Yojana Organic Farming) की प्रभावशीलता साफ झलकी।
जैविक खेती अपनाने से किसान संजय की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आई। उन्हें महंगे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर खर्च नहीं करना पड़ा। वर्तमान में उनके खेत में मक्का की बालियाँ मजबूत हैं और दानों का भराव बेहतर हुआ है।
जैविक उत्पाद होने के कारण बाजार में उन्हें बेहतर दाम मिलने की भी संभावना है। संजय का कहना है कि पहले रासायनिक खेती से खर्च अधिक होता था और जमीन भी कठोर हो रही थी, जबकि अब प्राकृतिक खेती (Dhan Dhaanya Yojana Organic Farming) से फसल भी अच्छी मिली और मुनाफा भी बढ़ा है।
किसान संजय की यह सफलता दंतेवाड़ा जिले के अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही है। उनकी पहल यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, सरकारी सहयोग और मेहनत से जैविक खेती न केवल संभव है, बल्कि लाभकारी भी है। धन धान्य योजना के उद्देश्य के अनुरूप यह उदाहरण बस्तर अंचल में विषमुक्त और टिकाऊ कृषि की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
