संपादकीय

संपादकीय:लोकतंत्र सेनानी राजकीय सम्मान के अधिकारी हैं

Democracy fighters deserve state honours: 1975 में जब तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था उस समय विपक्षी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की गई थी जो लगभग डेढ़ साल तक जेलों में बंद रहे थे।

केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार एनडीए की सरकार बनी तब इन मीसाबंदियों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा दिया गया और इन्हें मासिक पेंशन के रूप में सम्मान निधि देने का निर्णय लिया गया।

आपातकाल के दौरान इन लोकतंत्र के सेनानियों ने जो त्याग दिया था उसे देखते हुए इनका सम्मान होना ही चाहिए। छत्तीसगढ़ में तो पूर्ववर्ती भूपेश बघेल की सरकार ने इन लोकतंत्र सेनानियों की मासिक पेंशन ही बंद कर दी थी।

जिसे विष्णुदेव साय सरकार ने फिर से शुरू कराया है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने लोकतंत्र सेनानी सम्मान अधिनियम 2018 में संशोधन कर लोकतंत्र सेनानी की मृत्यु पर उनकी अंत्येष्टी के लिए सहायता राशि को बढ़ाकर दस हजार रुपए कर दिया है और लोकतंत्र सेनानी की मृत्यु पर राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराने का फैसला लिया है।

मध्यप्रदेश सरकार के इस निर्णय का लोकतंत्र सेनानी संगठन ने स्वागत किया है। मध्यप्रदेश की तरह ही छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव सरकार को भी लोकतंत्र सेनानियों के राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराने का निर्णय लेना चाहिए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि मध्यप्रदेश की तरह ही छत्तीसगढ़ में भी जल्द ही ऐसा प्रावधान किया जाएगा और लोकतंत्र सेनानी के निधन पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया जाएगा।

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