Chhattisgarhi Language : शब्दों के खेल से शुरू हुई प्रतियोगिता, जिसने छात्राओं को उनकी जड़ों से जोड़ दिया
Chhattisgarhi Language
पहली नज़र में यह आयोजन एक सामान्य शैक्षणिक गतिविधि जैसा प्रतीत (Chhattisgarhi Language) हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे प्रतियोगिता आगे बढ़ी, यह स्पष्ट होता गया कि इसका उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति से आत्मीय संवाद स्थापित करना था। मंच पर पूछे गए सवालों ने छात्राओं की सोच, समझ और सांस्कृतिक पकड़ को एक साथ परख लिया।
यह आयोजन बिलासपुर स्थित शासकीय माता शबरी नवीन कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में साहित्यिक समिति द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ी जनउला प्रतियोगिता के रूप में संपन्न हुआ। पटवारी प्रशिक्षण केंद्र के पास, सीपत रोड स्थित इस महाविद्यालय में आयोजित प्रतियोगिता में कुल 21 छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम का मंच संचालन करते हुए सहायक प्राध्यापक डॉ. बेला महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ी जनउला केवल पहेली नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन, संस्कृति और व्यवहार से जुड़ा ऐसा बौद्धिक अभ्यास है, जो विद्यार्थियों की तर्कशक्ति और भाषा-बोध को मजबूत करता है।
साहित्यिक समिति की संयोजक डॉ. इसाबेला लकड़ा ने अपने वक्तव्य में कहा कि जनउला छत्तीसगढ़ी जीवनशैली की रचनात्मक अभिव्यक्ति है, जिसमें प्रकृति, समाज और जीवन मूल्यों का सहज समावेश दिखाई (Chhattisgarhi Language) देता है। उन्होंने इसे नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बताया।
प्रभारी प्राचार्य डॉ. शशिकला सिन्हा ने कहा कि वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ की प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थानीय भाषा और संस्कृति का ज्ञान आवश्यक हो गया है। इस प्रकार की प्रतियोगिताएं छात्राओं को अकादमिक तैयारी के साथ-साथ सांस्कृतिक समझ भी प्रदान करती हैं।
प्रतियोगिता के लिए प्रश्नों का संकलन स्ववित्तीय प्राध्यापक कु. खगेश्वरी साहू द्वारा किया गया, जिसमें “एक हड़िया म दू रंग के पानी” (अंडा) और “बिन पांखी के सुवना उड़ी चले अकास” जैसे रोचक जनउला शामिल थे। स्कोरर की भूमिका सहायक प्राध्यापक डॉ. रश्मि जैन ने निभाई।
