छत्तीसगढ़

Chhattisgarh High Court : हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दिव्यांगता प्रमाणपत्र विवाद में शिक्षक को राहत

छत्तीसगढ़ के Bilaspur से जुड़े एक अहम मामले में हाईकोर्ट ने शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के आदेश (Chhattisgarh High Court) को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस प्रमाण के किसी वैध प्रमाणपत्र को गलत ठहराना उचित नहीं है।

क्या था पूरा मामला (Chhattisgarh High Court)

महासमुंद जिले में पदस्थ सहायक शिक्षक लखन बिहारी पटेल को सुनने में दिक्कत के आधार पर वर्ष 2010 में मेडिकल बोर्ड द्वारा 45% से अधिक दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्होंने नौकरी प्राप्त की और वर्षों से सेवा दे रहे थे।

बाद में पारिवारिक विवाद के चलते उनके भाई ने शिकायत दर्ज कराते (Chhattisgarh High Court) हुए आरोप लगाया कि यह प्रमाणपत्र फर्जी है। इसके बाद प्रशासनिक जांच हुई और शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की अनुशंसा कर दी गई।

कोर्ट ने क्या कहा

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा मामलों में विशेषज्ञ संस्थाओं की राय सर्वोपरि होती है और न्यायालय को भी उसी पर भरोसा करना चाहिए।

साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि दिव्यांगता समय के साथ बदल सकती है, इसलिए बाद की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुराने प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित करना सही नहीं है, जब तक कि प्रमाणपत्र जारी करने में धोखाधड़ी साबित न हो।

आदेश क्यों हुआ रद्द

अदालत ने पाया कि प्रशासन ने 2018 की मेडिकल जांच के आधार पर 2010 में जारी प्रमाणपत्र को गलत (Chhattisgarh High Court) ठहराया, जो कानूनी रूप से उचित नहीं है। चूंकि किसी भी स्तर पर धोखाधड़ी का पुख्ता प्रमाण नहीं मिला, इसलिए शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आदेश रद्द कर दिया गया।

फैसले का महत्व

यह फैसला न सिर्फ संबंधित शिक्षक के लिए राहत भरा है, बल्कि ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल भी है। इससे स्पष्ट होता है कि बिना ठोस सबूत के किसी के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

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