CEEW Report Construction Dust : शहरों की हवा में ज़हर घोल रही निर्माण धूल, सेहत पर सीधा वार: CEEW की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

CEEW Report Construction Dust

देश के तेज़ी से बढ़ते कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स अब सिर्फ स्काईलाइन नहीं बदल रहे, बल्कि शहरों की हवा और लोगों की सेहत पर भी गहरा असर (CEEW Report Construction Dust) डाल रहे हैं। Council on Energy, Environment and Water (CEEW) की ताज़ा रिपोर्ट ने इस खतरे को साफ तौर पर सामने रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली, अमृतसर और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरी इलाकों में कंस्ट्रक्शन से उड़ने वाली धूल कुल PM2.5 प्रदूषण का करीब 18 से 20 प्रतिशत तक योगदान दे रही है।

रिपोर्ट बताती है कि यह प्रदूषण केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मज़दूरों और शहरों में रहने वाले आम लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। लगातार धूल भरे माहौल में सांस लेना आने वाले वर्षों में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन सकता है।

कंस्ट्रक्शन डस्ट से कौन-कौन सी बीमारियाँ बढ़ रहीं?

CEEW की स्टडी के अनुसार, निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मज़दूर सबसे ज़्यादा (CEEW Report Construction Dust) जोखिम में हैं। फिनिशिंग, कटिंग, ड्रिलिंग, पेंटिंग, कास्टिंग और सीज़निंग जैसे कामों के दौरान वे सीधे महीन धूल के संपर्क में आते हैं। इसके चलते

सीओपीडी, सिलिकोसिस, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर और किडनी से जुड़ी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहना धीरे-धीरे शरीर को भीतर से कमजोर करता है।

भारत में कंस्ट्रक्शन सेक्टर: ताकत भी, चुनौती भी

भारत का कंस्ट्रक्शन सेक्टर आर्थिक विकास की रीढ़ माना जाता है, लेकिन इसके पर्यावरणीय असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

निवेश: वर्ष 2028 तक इस सेक्टर में करीब 36.58 लाख करोड़ रुपये के निवेश की संभावना है।

रोज़गार: लगभग 4 करोड़ लोगों की आजीविका सीधे इसी सेक्टर से जुड़ी है।

जीडीपी योगदान: फिलहाल देश की जीडीपी में इसका योगदान लगभग 8 प्रतिशत है।

यानी यह सेक्टर जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी इसकी ज़िम्मेदारी भी बनती है।

प्रदूषण कम करने के लिए क्या ज़रूरी है?

रिपोर्ट में कंस्ट्रक्शन डस्ट से निपटने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं।

निर्माण स्थलों पर नियमित पानी का छिड़काव अनिवार्य किया जाए।

मज़दूरों को उचित क्वालिटी के मास्क और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।

PM2.5 की निगरानी के लिए रीयल-टाइम सेंसर लगाए जाएं।

जोखिम का आकलन करने के लिए ‘हेल्थ के लिए सब्सटेंस हैज़र्ड्स का कंट्रोल’ जैसे टूल्स का उपयोग हो।

पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा जारी नए कंस्ट्रक्शन और डेमोलिशन वेस्ट रूल्स व दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन कराया जाए।

CEEW की रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि अगर समय रहते निर्माण गतिविधियों को पर्यावरण के अनुकूल नहीं बनाया गया, तो शहरी विकास की कीमत लोगों की सेहत को चुकानी (CEEW Report Construction Dust) पड़ेगी। अब ज़रूरत है कि विकास और स्वच्छ हवा – दोनों के बीच संतुलन बनाया जाए।

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