CAF Recruitment : 7 साल का इंतज़ार, खाली पद और टूटा भरोसा… CAF अभ्यर्थियों का गुस्सा क्यों डिप्टी सीएम हाउस तक पहुंचा

CAF Recruitment

छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स (CAF) भर्ती से जुड़े अभ्यर्थियों का आक्रोश अचानक नहीं फूटा है, बल्कि यह सात साल से जमा होते जा रहे धैर्य, निराशा और उपेक्षा का नतीजा है। वर्ष 2018 में CAF के 1786 पदों पर भर्ती (CAF Recruitment) प्रक्रिया हुई थी, जिसमें लगभग 417 अभ्यर्थी वेटिंग लिस्ट में रह गए। आज हालत यह है कि CAF में तीन हजार से अधिक पद खाली हैं, लेकिन वेटिंग लिस्ट के ये अभ्यर्थी अब भी बेरोजगार हैं।

पिछले 13 दिनों से सौ से अधिक अभ्यर्थी अपने माता-पिता, पत्नी और छोटे बच्चों के साथ रायपुर तूता धरना स्थल पर बैठे हैं। यह महज एक आंदोलन नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा है जिनकी जिंदगी फैसलों की फाइलों में अटकी हुई है। इसी दौरान एक अभ्यर्थी के छह महीने के बच्चे की तबीयत बिगड़ना इस संघर्ष की मानवीय कीमत को सामने लाता है। शनिवार को जब धैर्य की सीमा टूटी, तो अभ्यर्थियों ने डिप्टी सीएम विजय शर्मा के बंगले का घेराव कर दिया।

सरकार की ओर से आश्वासन जरूर मिला है। डिप्टी सीएम ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के दिल्ली से लौटने के बाद पूरे मामले पर चर्चा कर प्रतिनिधिमंडल को बुलाया जाएगा और तब तक धरना समाप्त करने की अपील की गई है। लेकिन सवाल यही है कि सात साल से सिर्फ आश्वासन ही क्यों मिल रहे हैं?

अभ्यर्थियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर भी अपनी स्थिति बताई। कुछ दिन पहले उनका यह कहना कि “नक्सली होते तो शायद करियर बेहतर होता” भले ही तीखा हो, लेकिन यह व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास को दिखाता है। दूसरी ओर शासन-प्रशासन की भी मजबूरी है। भर्ती (CAF Recruitment) प्रक्रिया, नियम और कानूनी पेच।

यहां गलती सिर्फ एक पक्ष की नहीं है। अभ्यर्थियों का आक्रोश जायज है, लेकिन शासन की चुप्पी और फैसलों में देरी ने हालात को विस्फोटक बनाया है। जब खाली पद हों, चयन प्रक्रिया पूरी हो और फिर भी योग्य युवा मजदूरी करने को मजबूर हों, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। अब जरूरत सिर्फ समझाइश की नहीं, बल्कि ठोस और समयबद्ध निर्णय की है, वरना यह भरोसे की दरार और गहरी होगी।