
जब ढलते सूरज की नारंगी किरणों ने भारत-पाकिस्तान की सरहद को छुआ, तो अमृतसर का वाघा बॉर्डर केवल एक सीमा रेखा नहीं, बल्कि जोश और जज्बे का एक जीवंत महाकाव्य (BSF Retreat Ceremony Wagah) बन गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय रायपुर द्वारा आयोजित अंतर-राज्यीय प्रेस दौरे के अंतिम चरण में छत्तीसगढ़ के 14 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार शाम वाघा-अटारी बॉर्डर पर होने वाली विश्व प्रसिद्ध ‘बीटिंग रिट्रीट’ सेरेमनी का प्रत्यक्ष अवलोकन किया।
रायपुर की शांत गलियों से निकलकर सीमा के इस ‘जीरो लाइन’ तक पहुँचे पत्रकारों के लिए यह अनुभव केवल एक रिपोर्टिंग का हिस्सा नहीं था, बल्कि राष्ट्रभक्ति के उस ज्वार को महसूस करना था, जो हर हिंदुस्तानी के सीने में धड़कता है। शाम के ठीक 4:30 बजे थे, गैलरी में हजारों की भीड़ ‘भारत माता की जय’ के नारों से आसमान (BSF Retreat Ceremony Wagah) गुंजा रही थी। छत्तीसगढ़ी पत्रकारों का दल जब वीआईपी दीर्घा में बैठा, तो सामने सीमा सुरक्षा बल) के जांबाज पुरुष और महिला जवान अपनी रौबदार मूंछों, मखमली कलगी वाली टोपियों और अदम्य साहस के साथ तैनात थे। (BSF Retreat Ceremony Wagah)
जैसे ही सेरेमनी की शुरुआत हुई, बीएसएफ के जवानों के बूटों की जमीन पर पड़ने वाली धमक ने वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा भर दी। इस परेड का सबसे गौरवशाली और संवेदनात्मक पहलू बीएसएफ की महिला प्रहरियों का शामिल होना था। उनके चेहरे पर वही कठोर अनुशासन, वही तीक्ष्ण दृष्टि और वही फौलादी इरादा था, जिसने दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। जवानों का पैर सिर के ऊपर तक ले जाकर जमीन पर पटकना और उनकी आंखों में झलकता आत्मविश्वास यह बता रहा था कि देश की सरहदें सुरक्षित और सशक्त हाथों में हैं।
छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने देखा कि कैसे महिला और पुरुष प्रहरियों के बीच अनुशासन और आक्रामकता का एक अनूठा संतुलन सीमा पर बनाए रखा जाता है। सेरेमनी का सबसे भावुक क्षण वह था, जब बिगुल की आवाज के साथ राष्ट्रध्वज को पूरे सम्मान के साथ धीरे-धीरे नीचे उतारा गया। यह ‘बीटिंग रिट्रीट’ की वह प्राचीन सैन्य परंपरा है, जो सूर्यास्त के समय युद्ध विराम और शांति का प्रतीक मानी जाती है।
तिरंगे को पूरी मर्यादा के साथ समेटते हुए जवानों के चेहरों पर जो गंभीरता थी, उसने छत्तीसगढ़ी प्रतिनिधिमंडल को भीतर तक झकझोर दिया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने महसूस किया कि रायपुर में फहराते जिस तिरंगे को हम रोज देखते हैं, उसकी गरिमा को बनाए रखने के लिए यहाँ सरहद पर जवान हर पल किस कदर मुस्तैद रहते हैं।
परेड के समापन के पश्चात, प्रतिनिधिमंडल ने बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट हिमांशु से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान सरहद की सुरक्षा और जवानों -विशेषकर महिला प्रहरियों की चुनौतियों और उनके कठिन जीवन पर चर्चा हुई, जिसने पत्रकारों को रक्षा तंत्र की संवेदनशीलता से रूबरू (BSF Retreat Ceremony Wagah) कराया। इसके उपरांत पत्रकारों ने परेड कमांडर राधेश्याम से भेंट की और उनके उत्कृष्ट नेतृत्व व पूरी टुकड़ी के शानदार और ओजस्वी प्रदर्शन के लिए मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ी पत्रकारों ने अपनी माटी की मिठास और कला को सरहद के प्रहरियों के साथ साझा किया। छत्तीसगढ़ की ओर से जवानों को ‘छत्तीसगढ़ी राजवस्त्र’ (राजकीय गमछा) पहनाकर और ‘बस्तर कलाकारी’ (धातु शिल्प मोमेंटो) भेंट कर सम्मानित किया गया। यह क्षण केवल सम्मान का नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सेतु था-बस्तर के अरण्यों से लेकर वाघा की जीरो लाइन तक के साझा संघर्ष और शौर्य का। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने बीएसएफ संग्रहालय का अवलोकन किया।
संग्रहालय की गैलरी में सहेजे गए हथियारों, ऐतिहासिक तस्वीरों और वीरता के दस्तावेजों को देखते हुए पत्रकारों ने महसूस किया कि आजादी की रक्षा के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकाई गई है। “स्याही में अब राष्ट्रवाद का रंग है”-वाघा बॉर्डर की गैलरी में बैठे छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए यह क्षण आत्म-साक्षात्कार का था।
दल के सदस्यों ने अनुभव किया कि बस्तर के जंगलों में सुरक्षा बलों का संघर्ष और वाघा की जीरो लाइन पर अडिग खड़े जवान को देखना, दोनों ही राष्ट्र सेवा के अद्भुत उदाहरण हैं। यहाँ की मिट्टी में एक अजीब सा खिंचाव है, जो आपको यह भूलने पर मजबूर कर देता है कि आप किस राज्य से हैं; यहाँ आप सिर्फ एक भारतीय हैं।



