Bilaspur High Court Verdict : हाई कोर्ट ने खींची अधिकारों की लक्ष्मण रेखा, सभी सेवा लाभों के लिए राजस्व अधिकारी नहीं दे सकते प्रमाण पत्र
Bilaspur High Court Verdict
सरकारी दस्तावेज पर एक हस्ताक्षर ने सालों तक किसी को आर्थिक सुरक्षा दे दी, लेकिन जब मामला अदालत पहुंचा तो उस अधिकार की वैधता पर ही सवाल (Bilaspur High Court Verdict) खड़े हो गए। आखिर कौन तय करेगा कि सरकारी कर्मचारी के बाद मिलने वाले लाभों का असली हकदार कौन है – यही इस फैसले का केंद्र बना।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर या तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारी सभी सेवा लाभों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि ये अधिकारी केवल कंट्रीब्यूटरी फैमिली पेंशन के उद्देश्य से आश्रित प्रमाण पत्र जारी करने के लिए अधिकृत हैं, जबकि ग्रेच्युटी, भविष्य निधि (PF) और अन्य वित्तीय लाभों के लिए सक्षम सिविल कोर्ट से आदेश लेना अनिवार्य है।
मामला बिलासपुर जिले के बिल्हा क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एक शासकीय शिक्षिका के निधन के बाद एक युवती ने खुद को उनकी जैविक संतान बताते हुए कलेक्टर कार्यालय में आवेदन (Bilaspur High Court Verdict) किया था। इसके आधार पर तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने उसे एकमात्र कानूनी वारिस घोषित करते हुए प्रमाण पत्र जारी कर दिया, जिसके चलते उसे पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ मिल गए।
इस कार्रवाई को मृतका के भाइयों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि उनकी बहन अविवाहित थीं और इसलिए सभी सेवा लाभों पर उनका अधिकार बनता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 और राज्य सरकार के प्रचलित निर्देशों का गहन परीक्षण किया।
हाई कोर्ट की साफ व्याख्या
अदालत ने कहा कि राजस्व अधिकारियों को केवल यह तय करने का सीमित अधिकार है कि परिवार पेंशन के लिए आश्रित कौन है। लेकिन जब मामला अन्य वित्तीय लाभों का हो, तो उत्तराधिकार का निर्धारण भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत केवल सिविल कोर्ट ही कर सकती है। इस प्रकरण में डिप्टी कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर प्रमाण पत्र जारी किया, जो कानूनन सही नहीं था।
हाई कोर्ट ने डिप्टी कलेक्टर द्वारा जारी प्रमाण पत्र को निरस्त (Bilaspur High Court Verdict) कर दिया है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रतिवादी द्वारा पहले से प्राप्त की गई राशि की फिलहाल कोई वसूली नहीं की जाएगी, जब तक कि सक्षम सिविल कोर्ट से इस संबंध में कोई विपरीत आदेश नहीं आ जाता।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को उचित कानूनी मंच पर आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता भी दी है। इस फैसले को भविष्य में ऐसे मामलों के लिए नज़ीर माना जा रहा है, जहां राजस्व अधिकारियों के अधिकारों की सीमा को लेकर भ्रम बना रहता है।
