Bilaspur High Court Judgment 2026 : मूक-बधिर पीड़िता की गवाही पर हाईकोर्ट की मुहर, उम्रकैद की सजा बरकरार

छत्तीसगढ़ के Chhattisgarh High Court ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट (Bilaspur High Court Judgment 2026) कर दिया है कि किसी गवाह की शारीरिक अक्षमता उसकी गवाही की विश्वसनीयता को कम नहीं करती। अदालत ने मूक-बधिर युवती द्वारा दिए गए संकेतों और इशारों को पूरी तरह वैध साक्ष्य मानते हुए दुष्कर्म के आरोपी को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
संकेतों को भी माना गया मौखिक साक्ष्य (Bilaspur High Court Judgment 2026)
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यदि कोई व्यक्ति बोल या सुन नहीं सकता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी बात को खारिज कर दिया जाए। संकेतों, इशारों या अन्य माध्यमों से दी गई जानकारी भी कानून की नजर में मौखिक साक्ष्य मानी जाएगी, बशर्ते वह भरोसेमंद हो और अन्य साक्ष्यों से मेल खाती हो।
रिश्तेदार ने ही बनाया शिकार
मामला बालोद जिले के अर्जुंदा क्षेत्र का है, जहां 19 वर्षीय मूक-बधिर युवती के साथ उसके ही रिश्तेदार ने घर में घुसकर दुष्कर्म (Bilaspur High Court Judgment 2026) किया। घटना के समय युवती घर पर अकेली थी और उसके माता-पिता खेत में काम करने गए हुए थे। शाम को जब परिजन लौटे तो युवती ने इशारों में पूरी घटना बताई, जिसके आधार पर पुलिस में शिकायत दर्ज की गई और आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
अदालत में अनोखे तरीके से दर्ज हुई गवाही
पीड़िता की स्थिति को देखते हुए ट्रायल कोर्ट ने साइन लैंग्वेज विशेषज्ञ की मदद ली। जहां संवाद में कठिनाई आई, वहां प्लास्टिक की गुड़िया के जरिए पीड़िता ने घटना को समझाया। इस पूरी प्रक्रिया के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया
अपील पर सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच, जिसमें Ramesh Sinha और Ravindra Kumar Agrawal शामिल थे, ने कहा कि पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है। मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट भी घटना की पुष्टि करती है, इसलिए सजा में कोई हस्तक्षेप करने का आधार नहीं बनता।
उम्रकैद के साथ जुर्माना भी बरकरार
अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 376(2) के तहत मृत्यु तक आजीवन कारावास और धारा 450 के तहत अतिरिक्त सजा सुनाई है। साथ ही उस पर 21 हजार रुपये का जुर्माना (Bilaspur High Court Judgment 2026) भी लगाया गया है।
न्याय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संदेश
इस फैसले को न्यायिक संवेदनशीलता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि न्याय पाने का अधिकार हर व्यक्ति को समान रूप से है, चाहे वह किसी भी शारीरिक स्थिति में क्यों न हो।



