Bilaspur High Court : घरेलू हिंसा कानून पर सवाल, एक आदेश ने खोली कई परतें, हाई कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी

Bilaspur High Court

घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत चल रही एक कार्यवाही को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने जेएमएफसी, सूरजपुर के एक विवादित आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि अस्पष्ट और अधूरी शिकायतों के आधार पर किसी को न्यायिक प्रक्रिया में उलझाए रखना स्वीकार्य नहीं है।

यह मामला जेएमएफसी, सूरजपुर द्वारा 26 नवंबर 2024 को पारित उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायर प्रकरण को गैर-अनुरक्षणीय मानने से इनकार कर दिया गया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।

प्रकरण के अनुसार, पति के साथ-साथ उसके माता-पिता और बहन को भी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत आरोपी बनाया गया था। याचिका में तर्क दिया गया कि शिकायत में न तो किसी कथित घटना की स्पष्ट तिथि बताई गई है, न स्थान, न ही यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार का कृत्य किस व्यक्ति द्वारा किया गया। इसके बावजूद निचली अदालत में कार्यवाही आगे बढ़ाई जा रही थी।

डिवीजन बेंच ने डोमेस्टिक इन्सिडेंट रिपोर्ट (DIR) का अवलोकन करते हुए गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में दहेज मांग, शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना जैसे आरोप सामान्य और अनिर्दिष्ट शब्दों में दर्ज हैं। किसी विशेष घटना, चोट, राशि या वस्तु का कोई उल्लेख नहीं है, जिससे आरोप प्रथम दृष्टया ही कमजोर प्रतीत होते हैं।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 9(1)(ख) के तहत संरक्षण अधिकारी का दायित्व है कि घरेलू घटना रिपोर्ट पूर्ण, सटीक और प्रासंगिक विवरणों से युक्त हो। इस दायित्व के पालन में चूक होने पर धारा 12 के तहत शुरू की गई पूरी कार्यवाही ही कानूनन टिकाऊ नहीं रह जाती।

अदालत के संज्ञान में यह तथ्य भी आया कि शिकायतकर्ता द्वारा विभिन्न मंचों पर पहले से चल रही अन्य न्यायिक कार्यवाहियों की जानकारी मौजूदा आवेदन में छुपाई गई थी। डिवीजन बेंच ने इसे महत्वपूर्ण तथ्यों का दमन मानते हुए कहा कि ऐसा आचरण न्यायसंगत राहत पाने के अधिकार को कमजोर करता है और दुर्भावना के संकेत देता है।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने दो टूक कहा कि यदि कोई कार्यवाही कानून के आवश्यक तत्वों के बिना, दुर्भावना से प्रेरित होकर या न्यायालयीन प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में सामने आती है, तो उसे जारी रखना न्याय के हित में नहीं है। ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने 19 अक्टूबर 2022 की घरेलू घटना रिपोर्ट, उससे संबंधित आवेदन, जेएमएफसी, सूरजपुर में लंबित समस्त कार्यवाही और 26 नवंबर 2024 का विवादित आदेश निरस्त कर दिया। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया कि यह आदेश किसी भी पक्ष को कानून के अनुसार सक्षम सिविल या पारिवारिक न्यायालय में वैकल्पिक उपाय अपनाने से नहीं रोकता।

यह फैसला न केवल संबंधित पक्षों के लिए राहत का कारण बना, बल्कि यह भी संकेत देता है कि कानून की शक्ति तभी प्रभावी है, जब उसका इस्तेमाल स्पष्ट तथ्यों, ईमानदार खुलासे और विधिसम्मत प्रक्रिया के साथ किया जाए।

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