Bilaspur High Court : दान की संपत्ति लौटानी पड़ी, हाई कोर्ट ने बुजुर्गों के हक में दिया सख्त संदेश

बिलासपुर हाई कोर्ट ने बुजुर्गों की सुरक्षा से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट कर दिया है कि संपत्ति दान में लेने वाले की जिम्मेदारी केवल कागजी नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी (Bilaspur High Court) दोनों होती है।
जस्टिस एनके व्यास की सिंगल बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि भले ही गिफ्ट डीड में देखभाल की शर्त लिखित रूप में न हो, लेकिन बुजुर्गों की सेवा-सुश्रुषा एक निहित दायित्व है। इस दायित्व के उल्लंघन पर हाई कोर्ट ने गिफ्ट डीड को निरस्त कर दिया।
मामला बिलासपुर जिले के कोनी क्षेत्र का है, जहां एक बुजुर्ग दंपति ने अपने भतीजे और बेटी को संपत्ति इस भरोसे पर दान में दी थी कि वे बुढ़ापे में उनका सहारा बनेंगे। आरोप है कि संपत्ति मिलने के बाद उनका व्यवहार बदल गया और बुजुर्ग दंपति को धीरे-धीरे घर से अलग कर दिया गया। हालात इतने बिगड़े कि दोनों को वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ी।
बुजुर्ग सुरेशमणि तिवारी ने इस व्यवहार से आहत होकर प्रशासनिक मंच का रुख (Bilaspur High Court) किया। एसडीएम और कलेक्टर ने मामले की जांच के बाद दंपति के पक्ष में निर्णय दिया और संपत्ति वापस दिलाने के आदेश दिए। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज कर प्रशासनिक फैसले को सही ठहराया।
अदालत ने अपने निर्णय में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि दान के बाद बुजुर्गों की उपेक्षा या प्रताड़ना होती है, तो ऐसा संपत्ति हस्तांतरण अनुचित प्रभाव माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में शर्तों का लिखा होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को संरक्षण देना है।
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि उपलब्ध तथ्यों से यह साफ है कि संपत्ति लेने वाले पक्ष ने अपने दायित्वों का निर्वहन (Bilaspur High Court) नहीं किया। इसलिए ट्रिब्यूनल और अपीलीय प्राधिकरण द्वारा गिफ्ट डीड रद्द करने का फैसला पूरी तरह वैध है। साथ ही, कोर्ट ने पूर्व में जारी अंतरिम आदेश को भी निरस्त कर दिया।
यह फैसला न सिर्फ बुजुर्ग दंपति को राहत देता है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि दान केवल संपत्ति का हस्तांतरण नहीं, बल्कि भरोसे और जिम्मेदारी का रिश्ता भी होता है।



