करीब दो दशक पुराने अहमदाबाद धमाकों के मामले में मंगलवार को अहम फैसला सामने (Ahmedabad Blast) आया। फैसले के बाद अदालत परिसर से लेकर कानूनी हलकों तक इसकी चर्चा होती रही। पीड़ित परिवारों की नजरें लंबे समय से इस निर्णय पर टिकी थीं और अब अदालत ने मामले में अपना अंतिम रुख स्पष्ट कर दिया है।
इस बहुचर्चित मामले में हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले की समीक्षा करते हुए दोषियों की सजा पर अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे का भी आदेश दिया, जिससे वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे लोगों को राहत मिली है।
38 दोषियों की फांसी और 11 की उम्रकैद बरकरार Ahmedabad Blast
साल 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार धमाका मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने 38 दोषियों को दी गई फांसी की सजा और 11 दोषियों की उम्रकैद को यथावत रखा। साथ ही 56 मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और 200 से अधिक घायलों को एक लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया।
70 मिनट में हुए थे 21 धमाके
26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद शहर में करीब 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार धमाके हुए थे। इन विस्फोटों में 56 लोगों की मौत हुई थी, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। हमलावरों ने नरोदा, बापू नगर, सरखेज और हटकेश्वर सहित कई भीड़भाड़ वाले इलाकों, बसों, अस्पतालों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाया था।
टिफिन बॉक्स में छिपाए गए थे बम
जांच में सामने आया था कि विस्फोटक सामग्री साइकिलों पर रखे टिफिन बॉक्स में छिपाई (Ahmedabad Blast) गई थी। शुरुआती धमाकों के कुछ समय बाद दो अस्पताल परिसरों में भी विस्फोट किए गए, जहां पहले धमाकों में घायल लोगों का इलाज चल रहा था। इस वजह से जानमाल का नुकसान और बढ़ गया था।
2022 में सुनाई गई थी सजा
घटना के करीब 14 वर्ष बाद वर्ष 2022 में विशेष अदालत ने 38 दोषियों को फांसी और 11 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने इस मामले को दुर्लभतम श्रेणी का बताते हुए कठोर दंड को उचित माना था। यह भी उल्लेखनीय रहा कि एक ही मामले में पहली बार 38 दोषियों को एक साथ फांसी की सजा सुनाई गई थी।
हाई कोर्ट में पहुंचा था मामला
विशेष अदालत के फैसले के बाद सभी दोषियों ने गुजरात हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। वहीं राज्य सरकार ने भी फांसी की सजा की पुष्टि के लिए याचिका (Ahmedabad Blast) लगाई थी। कानूनी प्रक्रिया के तहत किसी भी दोषी को फांसी दिए जाने से पहले हाई कोर्ट की मंजूरी आवश्यक होती है। इसी प्रक्रिया के तहत मामले की सुनवाई के बाद अब हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है।
