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बस्ते के बोझ तले दबता बचपन खोती जा रही बच्चों की मुस्कान

जितेन्द्र नामदेव
कवर्धा/नवप्रदेश।
शिक्षा के बढ़ते प्रतिस्पर्धी दौर में जहां बच्चों को बेहतर भविष्य देने की होड़ लगी हुई है, वहीं दूसरी ओर मासूम बचपन भारी स्कूल बैग के बोझ तले दबता जा रहा है। रोजाना किताबों, कॉपियों, लंच बॉक्स, पानी की बोतल और अन्य शैक्षणिक सामग्री से भरा भारी बस्ता उठाकर स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों की परेशानी किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद इस गंभीर समस्या पर न तो स्कूल प्रबंधन गंभीर नजर आ रहा है और न ही संबंधित विभाग कोई ठोस पहल करता दिखाई दे रहा है।

वर्तमान समय में अधिकांश निजी विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए अनेक विषयों की किताबें और अतिरिक्त अध्ययन सामग्री अनिवार्य कर दी गई हैं। इसके कारण बच्चों के बस्तों का वजन लगातार बढ़ता जा रहा है। हालत यह है कि नर्सरी, प्री-नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी जैसे प्रारंभिक कक्षाओं के बच्चे भी अपनी क्षमता से कहीं अधिक वजन ढोने को मजबूर हैं। वहीं कक्षा पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों के बस्तों का वजन कई बार 10 से 15 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।

सुबह स्कूल जाते समय और छुट्टी के बाद घर लौटते समय छोटे-छोटे बच्चों को भारी बैग लेकर हांफते हुए देखा जा सकता है। कई बार बच्चों को बैग उठाने में कठिनाई होती है और अभिभावकों को उनकी मदद करनी पड़ती है। राह चलते लोग भी यह दृश्य देखकर चिंता व्यक्त करते हैं, लेकिन व्यवस्था में बदलाव नहीं होने से समस्या जस की तस बनी हुई है।

मासूम बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़
अभिभावक भी इस समस्या को महसूस करते हैं, लेकिन प्रतियोगिता और बेहतर शिक्षा की चाह में वे अपने बच्चों को पीछे नहीं रखना चाहते। इसी मानसिकता का लाभ कई निजी स्कूल उठा रहे हैं और आवश्यकता से अधिक किताबें व अध्ययन सामग्री विद्यार्थियों पर थोप दी जाती है। मासूम बच्चों के स्वास्थ्य और उनके सुनहरे भविष्य को ध्यान में रखते हुए अब समय आ गया है कि बस्ते का बोझ कम किया जाए, ताकि बचपन अपनी स्वाभाविक मुस्कान और खुशियों के साथ आगे बढ़ सके।

बच्चों में रीढ़, कंधों और मांसपेशियों संबंधी परेशानी
विशेषज्ञों का मानना है कि बचपन शारीरिक और मानसिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। ऐसे में लगातार भारी वजन उठाने से बच्चों की रीढ़, कंधों और मांसपेशियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे कम उम्र में ही कमर दर्द, पीठ दर्द, गर्दन दर्द और मांसपेशियों में खिंचाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है।

लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर बच्चों के शारीरिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।

प्रशासन ठोस कदम उठाए
बच्चों के बस्तों का वजन नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर शासन द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं और निगरानी के लिए समितियों का गठन भी किया गया था। हालांकि जमीनी स्तर पर इन नियमों का पालन होता नजर नहीं आता। ऐसे में आवश्यकता है कि शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन इस गंभीर विषय पर ठोस कदम उठाएं। मनमानी पर कार्रवाई करें।
तथा बच्चों के बस्तों का वजन निर्धारित मानकों के अनुसार सुनिश्चित करें।

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