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Judicial Delay Crisis : 52 रुपए की चोरी, 20 साल तक अदालत के चक्कर!

ओडिशा के संबलपुर से सामने आया एक मामूली चोरी का मामला अब देश की न्याय व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन गया है। 52 रुपए के गुटखा और सिगरेट चोरी के आरोप में दर्ज केस का फैसला आने में करीब 20 साल लग गए। इस पूरे घटनाक्रम ने (Judicial Delay Crisis) को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

यह मामला वर्ष 2006 का है। संबलपुर जिले के बामरा क्षेत्र स्थित स्टेशन बस्ती में एक पान दुकान से गुटखा और सिगरेट चोरी होने की शिकायत दर्ज कराई गई थी। चोरी गए सामान की कीमत महज 52 रुपए बताई गई थी। पुलिस ने चार लोगों को चोरी और एक व्यक्ति को चोरी का सामान खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया था। बाद में सभी जमानत पर बाहर आ गए और वर्षों तक अदालत में पेश होते रहे।

लेकिन धीरे-धीरे मामला अदालती प्रक्रियाओं में उलझता चला गया। गवाह अदालत में पेश नहीं हुए, तारीख पर तारीख मिलती रही और केस लगभग भुला दिया गया। इसी दौरान शिकायतकर्ता समेत दो आरोपियों की मौत हो गई। आखिरकार मई 2026 में कुचिंडा एसडीजेएम कोर्ट ने बचे तीनों आरोपियों को बरी कर दिया।

इस मामले ने (Judicial Delay Crisis) की गंभीर तस्वीर सामने रख दी है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार देशभर में इस समय 4.90 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें करीब 3.32 करोड़ मामले एक साल से अधिक पुराने हैं। सिर्फ ओडिशा में ही 18 लाख से ज्यादा केस पेंडिंग हैं।

सबसे चिंता की बात यह है कि लाखों आपराधिक मामले 10 साल से अधिक समय से अदालतों में लंबित पड़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय मिलने में अत्यधिक देरी आम नागरिक के भरोसे को कमजोर करती है। कई मामलों में आरोपी, पीड़ित और गवाह तक फैसला आने से पहले दुनिया छोड़ देते हैं।

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लंबित मामलों के तेज निपटारे पर जोर देते हुए कहा था कि 2029 से पहले गंभीर आपराधिक मामलों के निपटारे का लक्ष्य तय होना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्टों को जमानत याचिकाओं की स्वतः लिस्टिंग, समयबद्ध सुनवाई और सॉफ्टवेयर आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने की सलाह दी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अदालतों में जजों की कमी, बार-बार स्थगन, गवाहों की अनुपस्थिति, धीमी जांच प्रक्रिया और डिजिटल सिस्टम की कमी (Judicial Delay Crisis) के बड़े कारण हैं। कई बार मामूली मामलों में भी वर्षों तक सुनवाई चलती रहती है, जिससे न्याय प्रक्रिया बोझिल और महंगी बन जाती है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि छोटे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक समाधान, मध्यस्थता प्रणाली, डिजिटल सुनवाई और समयबद्ध ट्रायल जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा अदालतों में रिक्त पदों को भरना और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना भी आवश्यक माना जा रहा है।

संबलपुर का यह 52 रुपए वाला मामला केवल एक अदालती फाइल नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार का प्रतीक बन गया है। अब सवाल यही है कि क्या आने वाले वर्षों में अदालतों की कार्यप्रणाली में ऐसी तेजी आ पाएगी, जिससे आम लोगों को समय पर न्याय मिल सके।

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