
पोर्ट ब्लेयर (नवप्रदेश)। Coconut Research Centre in Andaman : अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में किए जा रहे नारियल अनुसंधान भारत की तटीय कृषि को सुदृढ़ करने, महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण तथा किसानों की आजीविका में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह जानकारी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-केंद्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईएआरआई), पोर्ट ब्लेयर में आयोजित एक संवाद के दौरान छत्तीसगढ़ के रायपुर से आए पत्रकारों को दी गई।
ये पत्रकार प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) द्वारा आयोजित एक अध्ययन एवं संपर्क दौरे पर थे, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय महत्व की विकासात्मक एवं अनुसंधान गतिविधियों से मीडिया को अवगत कराना है। इस अवसर पर वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अजीत वामन ने कहा कि नारियल द्वीपों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और यह खाद्य सुरक्षा, आय सृजन तथा बसाहट और जनजातीय समुदायों की पारंपरिक आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

डॉ. वामन ने बताया कि आईसीएआर-सीआईएआरआई द्वारा द्वीपीय और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की विशिष्ट चुनौतियों—जैसे अधिक आद्र्रता, लवणीय मिट्टी, चक्रवाती हवाएं और मौसमी जल संकट—को ध्यान में रखते हुए स्थान-विशेष अनुसंधान किया जाता है। उन्होंने कहा कि यहां विकसित की गई तकनीकें और किस्में देश के चक्रवात-प्रभावित तटीय राज्यों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
दौरे का एक प्रमुख आकर्षण विश्व नारियल जर्मप्लाज्म केंद्र रहा, जो एक अंतरराष्ट्रीय महत्व की संरक्षण और क्वारंटीन सुविधा है। इस केंद्र में फिजी, सोलोमन द्वीप, टोंगा और अमेरिकन समोआ जैसे उष्णकटिबंधीय द्वीपीय देशों से संकलित नारियल की आनुवंशिक सामग्री संरक्षित की गई है। अंडमान द्वीपों की भौगोलिक अलगाव की स्थिति के कारण यह केंद्र प्राकृतिक क्वारंटीन क्षेत्र के रूप में कार्य करता है, जिससे भारत के प्रमुख नारियल उत्पादक क्षेत्रों में कीट और रोगों के प्रवेश की आशंका न्यूनतम रहती है।

इस समृद्ध जर्मप्लाज्म संग्रह के आधार पर संस्थान के वैज्ञानिकों ने चार उन्नत नारियल किस्में विकसित की हैं, जिनमें बौनी किस्म ‘द्वीप अन्नपूर्णा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह किस्म शीघ्र फलन, उच्च तेल एवं कोप्रा प्रतिशत तथा तेज़ हवाओं के प्रति सहनशीलता के लिए जानी जाती है। उचित प्रबंधन में यह किस्म चार से पाँच वर्षों में फल देना शुरू कर देती है और प्रति पौधा प्रतिवर्ष 70 से 150 नारियल उत्पादन करती है।
कम ऊँचाई के कारण ‘द्वीप अन्नपूर्णा किस्म में कटाई के दौरान जोखिम और श्रम लागत दोनों में कमी आती है। वर्तमान में यह किस्म अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के अलावा ओडिशा, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे चक्रवात-प्रभावित राज्यों में भी अपनाई जा रही है। नारियल की किस्मों के अंतर को स्पष्ट करते हुए डॉ. वामन ने बताया कि जहाँ ऊँची किस्मों का जीवनकाल लगभग 100 वर्ष तक होता है और वे व्यावसायिक तेल उत्पादन के लिए उपयुक्त होती हैं, वहीं बौनी किस्में कोमल नारियल और नीरा उत्पादन के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं, क्योंकि इनकी कटाई आसान होती है।
नीरा, जो नारियल के पुष्पक्रम से स्वच्छ एवं अपकिण्वित रूप में एकत्र किया जाने वाला रस है, को खनिजों और प्राकृतिक शर्करा से भरपूर एक पोषक पेय बताया गया। डॉ. वामन ने नीरा और किण्वित ताड़ी के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि उचित विधि से संग्रहित नीरा सुरक्षित होता है और गर्भवती महिलाओं के लिए भी उपयुक्त माना जाता है।
पत्रकारों को एकीकृत नारियल आधारित कृषि प्रणाली के बारे में भी जानकारी दी गई, जिसमें नारियल के बागानों के नीचे अनानास, लौंग, काली मिर्च और सब्जियों की खेती कर भूमि की उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि की जाती है।
हालाँकि अंडमान द्वीपों में प्रतिवर्ष लगभग 3,200 मिलीमीटर वर्षा होती है, फिर भी शुष्क महीनों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस चुनौती से निपटने के लिए आईसीएआर-सीआईएआरआई ने अपने अनुसंधान फार्मों में वर्षा जल संचयन तालाब विकसित किए हैं, जिससे सूखे मौसम में नारियल बागानों को सिंचाई सहायता मिलती है। दौरे पर आए पत्रकारों ने नारियल की जैव-विविधता के संरक्षण, जलवायु-सहनशील किस्मों के विकास और टिकाऊ आजीविका को बढ़ावा देने में संस्थान की भूमिका की सराहना की और कहा कि अंडमान में हो रहा नारियल अनुसंधान भारत की तटीय और द्वीपीय कृषि के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक महत्व रखता है।



