Naxal Problem : मोदी-शाह-साय की रणनीति से ढहा नक्सलवाद का किला, 40 साल बाद बस्तर में अमन के फूल खिले

Naxal Problem

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माओवाद आंदोलन (Naxal Problem) जारी रहने के कारण बस्तर 40 वर्षों तक लगातार हिंसा से जूझता रहा। नक्सलवाद का दंश झेल रहे कई राज्यों में ढाई दशकों से शांति स्थापित करने की कोशिशें चलीं, पर समाधान नहीं निकल पाया। केंद्रीय गृह मंत्री, रेल मंत्री से लेकर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने नक्सलियों से कई बार हथियार छोड़ने की अपील की।

बातचीत शुरू हुई, मगर हर बार शांति वार्ता (Naxal Problem) अधर में लटकती गई। बम धमाके, गोलियों की तड़तड़ाहट ने बस्तर व उससे लगे राज्यों की शांत फिज़ाओं को रक्तरंजित किया। फोर्स, आदिवासी, राजनीतिक कार्यकर्ता और नक्सली सबकी कुर्बानियां धरती लाल करती रहीं।

2025 में पहली बार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की ठोस दिशा दिखने लगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की रणनीति (Naxal Problem) ने 40 वर्ष मजबूत रहे नक्सल किले को ध्वस्त कर दिया। सुरक्षा बलों के लगातार आपरेशन और सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति से हालात पूरी तरह बदलने लगे।

बस्तर में अब नक्सली बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं। शाह ने वार्ता के विकल्प खोलते हुए फोर्स को सघन अभियान का निर्देश दिया। इसी रणनीति से नक्सलियों की ताकत (Naxal Problem) लगातार टूट रही है। वे या तो मारे जा रहे हैं या हथियार डाल रहे हैं।

20 साल से होते रहे प्रयास, सफलता अब मिली

  1. वायएसआर ने आंध्र प्रदेश में किया था युद्धविराम

2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वायएसआर ने पीपुल्स वार से हिंसा रोकने की अपील की, 3 महीने का युद्धविराम भी घोषित हुआ। बातचीत के संकेत मिले, लेकिन आगे कोई प्रगति नहीं हुई और मामला ठंडा पड़ गया।

  1. शिबू सोरेन ने बातचीत का प्रस्ताव रखा

2010 में सोरेन ने नक्सलियों से संवाद शुरू करने की पेशकश की। युद्धविराम की बात हुई, लेकिन नक्सलियों ने कैदियों की रिहाई, ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करने जैसी कई शर्तें रख दीं। सरकार ने स्पष्ट कहा—पहले हथियार छोड़ें। वार्ता वहीं रुक गई।

  1. ममता बनर्जी ने केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री के तौर पर अपील की

2010 में ममता ने झारग्राम रैली में हाथ जोड़कर नक्सलियों से हिंसा छोड़ने की अपील की। माओवादी नेता किशन ने पत्र लिखकर कहा कि हथियार छोड़ना असंभव है। 2011 में बंगाल में बातचीत की कोशिश शुरू हुई, लेकिन उसी दौरान बड़े अभियान में किशनजी मारा गया और वार्ता खत्म हो गई।

  1. चिदंबरम ने स्वामी अग्निवेश को बनाया मध्यस्थ

2010 में राष्ट्रीय स्तर पर वार्ता की पहल हुई, पर इसी दौरान माओवादी नेता आज़ाद मुठभेड़ में मारे गए, जो वार्ता टीम का नेतृत्व करने वाले थे। इस घटना के बाद संवाद की पूरी प्रक्रिया ध्वस्त हो गई।

  1. रमन सिंह ने कई बार किया प्रयास

2009 से 2018 तक रमन सिंह ने बातचीत पर सहमति जताई, पर नक्सलियों की ओर से नेतृत्व तय न होना, लगातार हमले और राष्ट्रीय स्तर पर एकसमान रणनीति न बन पाने से वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी।

  1. भूपेश बघेल की पहल भी बेअसर

2021 व 2022 में माओवादी संगठन ने वार्ता की इच्छा जताई, पर सरकार ने शर्त रखी—बातचीत बिना शर्त और संविधान में विश्वास जताने के बाद ही संभव है। नक्सलियों ने सुरक्षा कैम्प हटाने और नेताओं की रिहाई जैसी मांगें रख दीं। वार्ता फिर ठप हो गई।