संपादकीय: फ्री बीज पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
Supreme Court's strong comment on free seeds
Editorial: फ्री बीज कल्चर को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी की है। तमिलनाडु में चुनाव के पूर्व मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली याचिका दाखिल की गई थी जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा है कि आखिर यह सब कब तक चलेगा। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह मामला सिर्फ तमिलनाडु का ही नहीं है। देश के अन्य सभी राज्य में जहां भी चुनाव होते हैं तो वहां सभी राजनीतिक पार्टियां मुफ्त रेवड़ी कल्चर को अपनाती हैं जो कतई उचित नहीं है।
मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली ऐसी घोषणाओं के कारण विकास बाधित होता है। कई राज्य सरकारें तो कर्ज में डुबी हुई हैं इसके बावजूद वे ऐसी लोकलुभावन घोषणाएं करती हैं जो न सिर्फ प्रदेश बल्कि पूरे देश के आर्थिक विकास में बाधा खड़ी करता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसके पहले भी कई बार फ्री रेवड़ी कल्चर को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी किन्तु राजनीतिक पार्टियां इससे कोई सबक लेने के लिए तैयार नहीं है।
उन्हें लगता है कि मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली ऐसी घोषणाओं से वे मतदाताओं का दिल जितने में सफल हो जाएंगे और सत्ता में आ जाएंगे। ऐसा होता भी रहा है। पहले पहल नई दिल्ली में नई नवेली आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली और मुफ्त पानी का मतदाताओ को प्रलोभन परोसा था और ऐतिहासिक बहुमत के साथ उसने नई दिल्ली में अपनी सरकार बना ली थी।
दूसरे चुनाव में तो उसने मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली घोषणाओं की भरमार ही कर दी। नतीजतन फिर उसे भारी बहुमत मिल गया। आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भी यही फार्मूला अपनाया और वहां भी आम आदमी पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिल गया। इसके बाद से तो राजनीतिक दलों के बीच फ्री रेवड़ी कल्चर की होड़ लग गई। कांग्रेस ने तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में चुनाव के मुफ्तखोरी को बढ़ाने देने वाली घोषणाओं की भरमार कर दी। परिणामस्वरूप इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस अपनी सरकार बनाने में सफल हो गई। यह बात अलग है कि इन सभी राज्यों में वह अपनी कई घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में विफल रही है क्योंकि इसके लिए उसके पाास पैसे ही नहीं है। वहां की राज्य सरकारें भारी घाटे में चल रही है स्थिति यह है कि अपने कर्मचारियों को वेतन देने के भी लाले पड़ गये हैं।
जब सरकारों के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसी मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली घोषणाओं के क्रियान्वयन पर तथा सरकारी अमले के वेतन भत्तों पर ही खर्च हो जाएगा तो विकास कार्यों के लिए जो राशि बचेगी वह तो ऊंट के मुंह में जीरा के समान ही होगी। नतीजतन स्वास्थ और शिक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में विकास कार्यों को अंजाम देने के लिए सरकार के सामने संसाधनों का टोटा होना स्वभाविक है।
यह ठीक है कि वंचित वर्ग को राहत देने के लिए वेल्फेयर स्कीम चलानी चाहिए क्योंकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक मदद पहुंचाना किसी भी सरकार का दायित्व बनता है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि ऐसे वेल्फेयर स्कीम के लिए लाभार्थियों का वर्गीकरण ही न किया जाये और सभी के लिए सरकारी खजाना खोल दिया जाये। उदाहारण के लिए नई दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने सभी महिलाओं के लिए बसों में फ्री यात्रा की घोषणा की थी और उसे क्रियान्वित भी कर दिया था।
नतीजतन ऐसी कामकाजी महिलाएं जिन्हें लाखों की सैलरी मिलती है वे भी इन बसों में फ्री यात्रा का लाभ उठाने लगी हैं। जबकि कायदें से सिर्फ उन्हीं कामकाजी महिलाओं को फ्री यात्रा की पात्रता दी जानी चाहिए थी जो बस यात्रा का व्यय नहीं उठा पाती। इसी तरह की और भी कई योजनाएं है जिसमें पात्र कुपात्र का ध्यान नहीं रखा जाता। जैसे बंगाल में विधानसभा चुनाव से पूर्व ममता बनर्जी ने सभी युवाओं को 1500 मासिक बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा कर दी है। नतीजतन वहां प्राप्त करने के लिए आवेदन करने युवाओं का सैलाब उमड़ पड़ा है और इन युवाओं में ऐसे लोग भी शामिल है जो हर लिहाज से साधन संपन्न है।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी के बाद भी राजनीतिक पार्टियां फ्री रेवड़ी कल्चर को अपनाने से बाज आएंगी ऐसा नहीं लगता क्योंकि उनके लिए चुनाव जितने का यही सबसे आसान उपाय है की जनता को प्रलोभन परोसा जाये और एन केन प्रकारेन उनका वोट कबाड़कर सत्ता हासिल कर ली जाए। इससे भले ही प्रदेश व देश पर आर्थिक बोझ बढ़े और विकास कार्यों के मार्ग में बाधा खड़ी हो उनकी बला से।
