Vichar

बेइंसाफ मीनरी में न्याय की खोज न्यायपालिका पर कितना भरोसा?

बेइंसाफ मीनरी में न्याय की खोज न्यायपालिका पर कितना भरोसा?

Vichar
यूनान के सत्यशोधक दार्शनिक सुकरात ने न्यायाधीश के चार गुण बताए हैं:- (1) उदारतापूर्वक सुनना, (2) बुद्धिमय उत्तर देना, (3) संयमित विचार करना और (4) निष्पक्षतापूर्वक फैसला करना। सदियों तक न्यायाधीशों के इन गुणों पर पुनर्विचार की ज़रूरत किसी को महसूस नहीं हुई है। भारतीय संविधान में भी अनेक जन-अधिकार दर्ज हैं। उनकी व्याख्या करना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। कानून के समक्ष समता, अंत:करण एवं अभिव्यक्ति की आजादी, धार्मिक स्वायत्तता वगैरह मनुष्य की सन्दर्भित गरिमाएं न्यायपालिका की व्याख्याओं के हवाले हैं। संविधान निर्माता 'हम भारत के लोग' सार्वभौम तो हैं लेकिन बेचारे 'हम भारत के लोग' ही हैं जिन्हें अपने अधिकारों के नष्ट होने या छिन जाने का लगातार खतरा राज्यसत्ता से बना होता है। तब पीडि़त व्यक्ति अदालतों के दरवाजों पर दस्तक देता है। न्यायालयों को ऐसी हालत में जन-न्याय करने के लिए संविधान ने असाधार
अहम मुद्दो से ध्यान भटकाने का हथियार बना मेन स्ट्रीम मीडिया

अहम मुद्दो से ध्यान भटकाने का हथियार बना मेन स्ट्रीम मीडिया

Chhattisgarh, Vichar
यशवंत धोटे गुजरात में चुनाव चल रहे हैं। भाजपा किला बचाने की जद्दोजहद में वह सब कुछ कर रही है जो उसकी तासीर में नही है। हाल ही में आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर ने अयोध्या में राममन्दिर निर्माण की मध्यस्थता की पहल कर यूपी के सन्त समाज से मुलाकात की। मीडिया ने वो तीन पिक दिन गुजरात के मुद्दे से हटाकर यूपी पर केन्द्रित कर दिए। कालान्तर में कमोबेश कुछ इसी तरह की पहल कर बाबा रामदेव व्यापारी बन चुके हैं। फिलहाल पूरे देश में फिल्म पद्मावती को लेकर चल रहे प्रदर्शन भी कुछ इसी तरह के दिखते हैं। दरअसल इतिहास और इतिहासकारो के द्वन्द में फंसा 21 वी सदी का युवा छटपटाते पंूछ रहा हैं कि इन सारे मुद्दो को अभी कब्र से निकालने की जरूरत क्या थी? लेकिन ये युवा इसलिए पूछ रहे है कि वे अभी उम्र्दराज नही हुए हैं. वे राजनीति का ककहरा नही जानते। वे धर्म और राजनीति के काकटेल से होने वाले नशे को नही ज
”उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच नौकरी, भीख निदान”

”उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच नौकरी, भीख निदान”

Chhattisgarh, Vichar
यशवंत धोटे छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। प्रदेश की सकल घेरलू उत्पाद में कृषि का योगदान 18 प्रतिशत है। प्रदेश में निरा फसली क्षेत्र का 31 प्रतिशत सिंचित है जिसमें निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। राज्य में कुल 37.46 लाख कृषि परिवार है। प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 35 प्रतिशत कृषि के अंतर्गत निरा क्षेत्र है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 की स्थिति में भारत के राज्यों में प्रति दस हजार पर कार्यशील जनसंख्या में कृषि एवं कृषि से संबंधित गतिविधियों में संलग्न जनसंख्या का सर्वाधिक प्रतिशत छत्तीसगढ़ में है। प्रदेश में प्रति दस हजार कार्यशील जनसंख्या में 8142 व्यक्ति कृषि या संबंधित गतिविधियों में रोजगार प्राप्त करते हैं। जबकि मध्यप्रदेश में यह संख्या 6901, महाराष्ट्र में 6947, उड़ीसा में 5926 एवं झारखंड में 5125 है। इस प्रकार स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में कृषि एवं संबं
पीली पत्रकारिता या नीली राजनीति

पीली पत्रकारिता या नीली राजनीति

Vichar
यशवंत धोटे कुछ गंदे लोगों ने काली कमाई की लालच में काले कारनामों का कारखाना ही खोल रखा है। इन कलमुंहों की काली करतूतों के कारण हर धंधा गंदा होता जा रहा है। विडंबना यह है कि आज तक ऐसी कोई झाड़ू नहीं बन पाई है जो इस गंदगी की सफाई कर सके। नतीजतन सड़ांध मारती यह गंदगी चहुंओर फैलती जा रही है। इस दुर्गंध से न तो राजनीति बची है और न ही पत्रकारिता अछूती है। छत्तीसगढ़ में एक और सीडी कांड ने रायपुर से लेकर नई दिल्ली तक एक नया सियासी बवाल खड़ा कर दिया है। लोग समझ नहीं आ पा रहे है कि यह पीली पत्रकारिता है या नीली राजनीति? इस सीडी कांड को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गये है। मामला प्रदेश के एक कद्दावर मंत्री राजेश मूणत से जुड़ा हुआ है जो मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के बेहद करीबी माने जाते है। यही वजह है कि पूरी सत्ता और संगठन उनके साथ मजबूती से खड़े है। दूसरी तरफ इस सीडी कांड को लेकर जिस वरिष्
क्या बदलेगा राहुल की ताजपोशी से..

क्या बदलेगा राहुल की ताजपोशी से..

Vichar
राजनैतिक दलों में चेहरे बदलने का दौर चल रहा है। इस दौर की मुकम्मल शुरुआत भारतीय जनता पार्टी ने की थी। भारत माता के तीन धरोहल -अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर की जगह नरेंद्र मोदी और अमित शाह आ गये थे। समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह की जगह अखिलेश यादव और अब कांग्रेस में सोनिया गांधी की जगह राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की कोशिशें परवान चढऩे ही वाली हैं। बसपा में मायावती के भाई भतीजे जगह पाने लगे हैं। क्या कांग्रेस में हो रहा बदलाव क्या भाजपा की तरह फलीभूत हो पाएगा। सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष हैं। १९ सालों से वह अकेली योद्धा हैं। पति राजीव गांधी की मौत के बाद बड़े-बड़े भरोसेमंदों को साथ छोड़ते देखा है। इंदिरा गांधी के कालखंड में पूरी पार्टी को उनसे अलग होने की दास्तान भी सुनी। सीताराम केसरी के पार्टी अध्यक्ष और नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्री के काल में उपेक्षा का दंश सहा है। उनके पूर्वजों क
आने वाले बीस साल बाद ….

आने वाले बीस साल बाद ….

Vichar
योगेश मिश्र बीस साल बाद की चिंता को थाम कर बैठना आज हो सकता है अतीत जीवी और वर्तमान जीवी लोगों को पसंद न आए। सच भी है कि जो बीस साल बाद होगा उसके लिए आज से चिंतित हो जाना लाजमी नहीं है। परिश्रमवादी और कर्मवादी यह भी सोच सकते हैं कि बीस साल बाद की चिंता कर हाथ पर हाथ धर बैठे रहने से बेहतर है कि कुछ उद्यम किया जाय, शायद चिंता की लकीरें ही मिट जाएं। पर हम जिस तरह बढ रहें हैं, जिस तेजी से बढ़ रहे हैं जिस तरफ बढ़ रह हैं उससे आशा की यह उम्मीद बेमानी हो जाती है। बीस साल के बाद का कालखंड एक ऐसा कालखंड होगा जिसमें आधुनिक भारत के इतिहास से रूबरू हुआ कोई शख्स नहीं बचेगा। जो मु_ी भर भगवान के नेमत से बच भी गये वे नीति नियंता नहीं रहेंगे। नीति निर्माता नहीं रहेंगे। बीस साल बाद इस देश की सारी अहम कुर्सियों पर देश के सारे क्षेत्रो की रहनुमाई करने वाले पदों पर एक ऐसी पीढी होगी जिसका हाथ पूर्वजों के दिए
ऋणमाफी और बोनस काफी नहीं-व्यापक कृषि सुधार आवश्यक हैं

ऋणमाफी और बोनस काफी नहीं-व्यापक कृषि सुधार आवश्यक हैं

Vichar
डॉ आलोक शुक्ला  इस समय किसानो पर राष्ट्रीय बहस छिड़ी हुई है. सभी राजनीतिक दल चुनावों में सफलता के लिये किसानों को खुश रखना चाहते हैं. राजनीतिक लाभ के लिये जहां विपक्षी दल किसान आंदोलन कराते हैं, वहीं सत्ता पक्ष किसानों की आय दोगुनी करने के लुभावने नारे देता है. कर्ज माफी और बोनस वितरण से किसानों का विश्वास जीतने का प्रयास किया जा रहा है. सचाई यह है कि यह केवल तात्कालिक राहत के उपाय हैं. कृषि? के लिये बड़े नीतिगत सुधार की आवश्यकता है. भारतीय कृषि की कम उत्पादकता और खेती पर निर्भर बड़ी आबादी – भारत में गेहूं, फल-सब्जी, दूध आदि का उत्पादन दुनिया में सबसे अधिक होता है, परन्तु़ यह कड़वी सचाई है कि इन चीज़ों में भी भारत की उत्पादकता बहुत कम है. चावल की उत्पादकता भारत में 2.4 टन/हे, चीन में 4.7 टन/हे और ब्राज़ील में 3.6 टन/हे है. चावल उत्पादकता में भारत का स्थान विश्व में 47 वां है. गेहूं की उत
शिक्षे तुम्हारा नाश हो, अब नौकरी के हित भी नहीं रही…

शिक्षे तुम्हारा नाश हो, अब नौकरी के हित भी नहीं रही…

Vichar
योगेश मिश्र महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने जब शिक्षा को लेकर चिंता जताई थी तब शिक्षा कम से कम नौकरी देने लायक तो थी ही, लेकिन शिक्षा का यह गुणधर्म भी आज खत्म हो गया है। हाल में शिक्षा को लेकर आई 'वल्र्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2018 लर्निंग टू रिलाइज एजुकेशन्स प्रामिस बताती है कि अब जो जितना पढ़ा लिखा है, वह उतना 'मिसफिटÓ है। क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन चैथाई बच्चे दो अंकों के घटाने वाले सवाल तक नहीं हल कर सकते। यही नहीं, पांचवी कक्षा के आधे छात्र भी ऐसा नहीं कर पाते हैं। विश्वबैंक की 'ग्लोबल एजुकेशनÓ नाम की इस रिपोर्ट में भारत की तालीम संकट की चेतावनी निहित है, जिसमें कहा गया है कि लाखों युवा छात्रों को बाद में जीवन यापन के कम अवसर मिलते हैं। क्योंकि उनके प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल उन्हें जीवन में सफल बनाने के लिए शिक्षा देने में फेल हो रहे हैं। रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के सांसद वो मुकाम ही हासिल नहीं कर पाए…

छत्तीसगढ़ के सांसद वो मुकाम ही हासिल नहीं कर पाए…

Chhattisgarh, Vichar
विशेष संवाददाता रायपुर (नवप्रदेश)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे विस्तार में छत्तीसगढ़ के लोगों को यह कतई उम्मीद नहीं थी कि केंद्रीय राज्यमंत्री विष्णुदेव साय के अलावा भाजपा के नौ में से किसी भी सांसद को मंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी। यदि मौजूदा केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय ड्राप भी कर दिए जाते तो भी उनको रिप्लेस करने किसी का नाम नहीं आता। यह जरूर है मीडिया व सियासी चर्चा रेमेश बैस को लेकर हो सकती थी। इसमें भी संशय शपथ को लेकर रहता । इसकी वजह आठ बार सांसद निर्वाचन होने के बाद भी उनमें राजनीतिक चार्तुयता का अभाव है। मंत्री बनाए जाने के चर्चे में उनकी पुरानी प्रोफाइल (मंत्री पद) व आठ बार सांसद निर्वाचित होना ही शामिल होता। आठ बार में भी सात बार वे भाजपा के विभिन्न लहरों में सवार होकर लोकसभा पहुंचते रहे। इस लिहाज से देखा जाए तो बैस अपने सुदीर्घ संसदीय काल में सूबे तो दूर संसदीय क्षेत्र
निकल पड़ती हैं इनकी सितंबर में

निकल पड़ती हैं इनकी सितंबर में

Vichar
गिरीश पंकज सितंबर माह का नंबर आते ही तीन चेहरे खुशी से झूम उठते हैं. सबसे पहले खुश होता है गरीब किस्म का मास्टर यानी शिक्षक क्योंकि पांच सितंबर को उसका दिवस जो मनाया जाता है. लोग किसी बेहद पुराने रिटायर्ड और गुमनाम हो चुके शिक्षक को गली-गली खोजते फिरते हैं उसका सम्मान करने के लिए. जो शिक्षक जितना जर्जर होता है, उतना ही इस सम्मान के सम्मान के लिए उपयुक्त होता है. ऐसा शिक्षक मिलते ही दो लोग उसको पकड़ कर लाते हैं और कुर्सी पर बैठा देते हैं. फिर अपनी और अपने पिछले सालों के कार्यक्रमों की तारीफ के क्रम में कभी-कभी उस शिक्षक का जिक्र कर उसकी भी तारीफ़ करते देते हैं. शिक्षक अनुमान लगा लेता है कि उसका ही गुणगान हो रहा होगा, क्योंकि उसकी सुनने वाली मशीन कब की बेकार हो चुकी होती है. बुजुर्ग शिक्षक गदगद भाव से बैठ रहता है और आखिर में एक शाल और श्रीफल प्राप्त करके धन्य-टाइप का कुछ- कुछ हो जाता है. व