नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों के भीतर नई हलचल तेज हो गई है। एक तरफ कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बनाए रखने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी प्रमुख Mayawati तक पहुंच बनाने की कोशिशों ने सियासी गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
कांग्रेस के दो वरिष्ठ दलित नेताओं के मायावती से मिलने की कोशिश के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या पार्टी एक साथ कई राजनीतिक विकल्प खुले रखना चाहती है।
मायावती तक पहुंचने की कोशिश से बढ़ी चर्चा
19 मई को कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम लखनऊ स्थित मायावती आवास पहुंचे थे। हालांकि मुलाकात नहीं हो सकी क्योंकि बसपा प्रमुख कथित तौर पर व्यस्त थीं।
लेकिन इस कोशिश ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया। खास बात यह रही कि घटना सामने आने के बाद कांग्रेस ने दोनों नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया और कहा कि यह अधिकृत मुलाकात नहीं थी।
इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषक इसे सामान्य शिष्टाचार मुलाकात मानने को तैयार नहीं हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस पर्दे के पीछे बसपा के साथ संवाद की संभावनाएं भी तलाश रही है।
दलित समीकरण पर कांग्रेस की नजर
उत्तर प्रदेश में दलित वोट लंबे समय तक बसपा की सबसे बड़ी ताकत रहा है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में बसपा का जनाधार कमजोर पड़ा है। ऐसे में कांग्रेस अब दलित राजनीति में अपनी नई जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
Rahul Gandhi लगातार संविधान आरक्षण और दलित अधिकारों के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस दलित वोटों के जरिए उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की रणनीति पर काम कर रही है।
अखिलेश यादव ने भी दिए संकेत
कांग्रेस नेताओं की मायावती तक पहुंचने की कोशिश के अगले ही दिन समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में कहा कि सपा ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर तैयारी पूरी कर ली है।
राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस के लिए एक संकेत के रूप में देखा गया। माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह गठबंधन के साथ भी तैयार है और जरूरत पड़ने पर अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में भी है।
कांग्रेस की दोहरी तैयारी
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर दो स्तरों पर रणनीति बना रही है। एक तरफ पार्टी सभी 403 सीटों पर संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार कर रही है वहीं दूसरी तरफ गठबंधन की स्थिति में 100 से 120 सीटों की मांग का खाका भी बनाया जा रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस बसपा समेत दूसरे सामाजिक समीकरणों को भी टटोलती नजर आ रही है।
बसपा ने फिलहाल रखी रणनीतिक दूरी
पूरे घटनाक्रम के दौरान बसपा की ओर से कोई खुली राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं आई। मायावती ने मुलाकात का समय नहीं दिया और पार्टी भी बयानबाजी से दूर रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा फिलहाल अपने पत्ते खोलने के मूड में नहीं है। पार्टी यह देखना चाहती है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर समीकरण किस दिशा में जाते हैं।
विपक्ष के भीतर भी बढ़ेगी खींचतान
उत्तर प्रदेश में 2027 की लड़ाई केवल भाजपा और विपक्ष के बीच नहीं मानी जा रही बल्कि विपक्षी दलों के भीतर भी सीटों नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों को लेकर बड़ी खींचतान देखने को मिल सकती है।
कांग्रेस की मायावती तक पहुंचने की कोशिश भले राजनीतिक रूप से सफल नहीं रही हो लेकिन इसने यह जरूर साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का असली मोलभाव अब शुरू हो चुका है।
