उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी अब अपनी सबसे बड़ी ताकत यानी बूथ स्तर के संगठन को फिर धारदार बनाने में जुट गई है। पार्टी इस बार संगठनात्मक फेरबदल में केवल जातीय संतुलन पर निर्भर रहने के बजाय “चुनाव जिताने वाले अनुभवी कार्यकर्ताओं” को प्राथमिकता देने की रणनीति पर काम कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी लगभग पूरी कर चुकी है। नई कार्यकारिणी में करीब 60 प्रतिशत ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को जगह दिए जाने की चर्चा है, जो लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे हैं और बूथ से लेकर क्षेत्रीय स्तर तक चुनावी प्रबंधन का अनुभव रखते हैं।
2024 के झटके के बाद बदली रणनीति
लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा नेतृत्व ने संगठनात्मक समीक्षा की थी। पार्टी के अंदर यह फीडबैक सामने आया कि कई क्षेत्रों में बूथ नेटवर्क पहले जैसा सक्रिय नहीं रहा। इसी वजह से अब भाजपा “संगठन पहले” की रणनीति पर लौटती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा समझ चुकी है कि सिर्फ सामाजिक समीकरणों के भरोसे चुनावी लड़ाई नहीं जीती जा सकती। मजबूत बूथ मैनेजमेंट, पन्ना प्रमुख नेटवर्क और जमीनी कार्यकर्ता ही पार्टी की असली ताकत हैं।
सरकार में जातीय संतुलन, संगठन में अनुभव
हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में भाजपा ने पिछड़ा और दलित वर्ग को साधने पर जोर दिया था। लेकिन संगठनात्मक बदलाव में पार्टी का फोकस अलग नजर आ रहा है।
मुख्यमंत्री Yogi Adityanath और प्रदेश भाजपा नेतृत्व अब ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाना चाहता है जो मैदान में सक्रिय हों और चुनावी मशीनरी को मजबूत कर सकें। प्रदेश अध्यक्ष Pankaj Chaudhary और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह लगातार संगठनात्मक बैठकों के जरिए नए ढांचे पर काम कर रहे हैं।
छह क्षेत्रों और सात मोर्चों में बड़े बदलाव संभव
सूत्रों के अनुसार भाजपा केवल प्रदेश कार्यकारिणी तक सीमित नहीं रहने वाली। पार्टी काशी, गोरखपुर, अवध, ब्रज, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कानपुर-बुंदेलखंड समेत छह संगठनात्मक क्षेत्रों में भी बड़े फेरबदल की तैयारी में है।
साथ ही भाजपा के सातों मोर्चों में नई नियुक्तियां हो सकती हैं। पार्टी 2027 से पहले हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत समन्वय और सक्रिय कैडर तैयार करना चाहती है।
पुराने नेताओं की दिल्ली शिफ्टिंग की चर्चा
भाजपा के अंदर यह भी चर्चा है कि कई वरिष्ठ नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर नई जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं। इसे संगठन में नए चेहरों के लिए जगह बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
पार्टी के भीतर अमर पाल मौर्य, विजय बहादुर पाठक, गोविंद नारायण शुक्ल, संतोष सिंह और पंकज सिंह जैसे नेताओं के नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं। भाजपा इन अनुभवी नेताओं के संगठनात्मक अनुभव का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती है।
निगमों और बोर्डों में भी होगा समायोजन
सूत्रों का कहना है कि संगठन में बदलाव के साथ-साथ कुछ पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को बोर्ड, निगम और आयोगों में जिम्मेदारी देकर संतुलन साधने की तैयारी भी चल रही है। भाजपा पहले ही हजारों कार्यकर्ताओं को स्थानीय निकायों में नामित कर चुकी है।
PDA नैरेटिव को जवाब देने की तैयारी
समाजवादी पार्टी लगातार PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति को आगे बढ़ा रही है। भाजपा अब इसका मुकाबला केवल सामाजिक संदेशों से नहीं बल्कि मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क से करना चाहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह संगठनात्मक अभियान सीधे तौर पर 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी है। पार्टी अब “चेहरे से ज्यादा कैडर” की रणनीति पर लौटती दिखाई दे रही है।
क्या BJP बदल रही है अपनी राजनीति?
हालांकि भाजपा जातीय समीकरणों से पूरी तरह दूरी नहीं बना रही। पार्टी अब डबल बैलेंस मॉडल पर काम करती दिख रही है। सरकार में सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठन में अनुभवी चुनावी प्रबंधन।
भाजपा नेतृत्व मानता है कि अगर बूथ स्तर का नेटवर्क फिर मजबूत हुआ, तो विपक्ष की चुनौती को कमजोर किया जा सकता है। लेकिन अगर सामाजिक असंतोष और संगठनात्मक थकान दोनों बढ़े, तो 2027 की लड़ाई भाजपा के लिए आसान नहीं होगी।
