Annapurna Yojana Bengal : महिलाओं को 3000 देने के वादे ने बढ़ाई टेंशन, कर्ज में डूबी सरकार पर बढ़ा दबाव

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद सबसे चर्चित योजना ‘अन्नपूर्णा योजना’ अब सरकार के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बनती दिखाई दे रही है। सरकार ने 1 जून से महिलाओं को हर महीने ₹3000 देने का ऐलान किया है, लेकिन राज्य की खराब वित्तीय स्थिति को देखते हुए अब प्रशासनिक स्तर पर चिंता बढ़ने लगी है। पहले से करीब 7.71 लाख करोड़ रुपए के कर्ज तले दबे बंगाल के सामने इतनी बड़ी योजना को लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं माना जा रहा है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने साफ किया है कि पूर्ववर्ती सरकार की ‘लक्ष्मीर भंडार योजना’ से जुड़ी सभी महिलाओं को नई योजना का लाभ दिया जाएगा। पहले सामान्य वर्ग की महिलाओं को ₹1500 और आरक्षित वर्ग की महिलाओं को ₹1700 प्रतिमाह मिलते थे, लेकिन अब यह राशि सीधे ₹3000 तक पहुंचाई जा रही है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा भी शुरू करने की घोषणा की गई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में करीब 2.21 करोड़ महिलाएं इस तरह की योजनाओं से जुड़ी हुई हैं। यदि सभी लाभार्थियों को हर महीने ₹3000 दिए जाते हैं, तो सरकार पर सालाना करीब ₹80 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। यही वजह है कि सरकार के भीतर अब वित्तीय संतुलन को लेकर गंभीर मंथन शुरू हो गया है।

सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई दौर की चर्चा की है। सरकार अब योजना में पात्रता संबंधी नई शर्तें जोड़ने या लाभार्थियों की संख्या सीमित करने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है ताकि वित्तीय बोझ को कम किया जा सके।

स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि सरकार ने हाल ही में राज्य कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग के गठन को भी मंजूरी दी है। इसके अलावा महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य प्रशासनिक खर्च पहले से ही सरकारी खजाने पर भारी दबाव बना रहे हैं।

हालांकि सरकार वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए कुछ पुराने खर्चों में कटौती की तैयारी भी कर रही है। जानकारी के अनुसार धार्मिक मानदेय योजनाओं को बंद करने का फैसला इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पूर्ववर्ती सरकार के समय इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को मासिक मानदेय दिया जाता था, जिसे अब समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

इसी बीच सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी छात्रों के लिए स्वामी विवेकानंद मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति योजना को फिर से शुरू करने की भी घोषणा की है। इससे साफ है कि सरकार एक तरफ कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वित्तीय संतुलन साधने की कोशिश में भी जुटी हुई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देने की रणनीति राजनीतिक रूप से असरदार हो सकती है, लेकिन यदि सरकार वित्तीय प्रबंधन में संतुलन नहीं बना पाई तो आने वाले समय में यही योजनाएं सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती हैं।

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