Editorial: खुद को दुनिया का चौधरी समझने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दुनिया की दूसरी बड़ी महाशक्ति चीन के सामने मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर सरेंडर करना ही पड़ा। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कट्टर दुश्मन चीन से हाथ मिलाने पर बाध्य होना पड़ गया क्योंकि इसके अलावा उनके पास ईरान युद्ध से बाहर निकलने के लिए कोई रास्ता ही नहीं बचा था। ट्रंप ने अपने पि_ू पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाकर ईरान के साथ समझौता करने की कोशिश की लेकिन बेल मुंडेर पर नहीं चढ़ पाई। यह कोशिश अभी भी जारी है लेकिन ईरान अभी भी अमेरिका की शर्तों को मानने के लिए राजी नहीं है।
न ही होर्मूज की नाकाबन्दी हटाने के लिए तैयार है। जिसकी वजह से आधी दुनिया में तेल और गैस का संकट विकराल रुप धारण करता जा रहा है और कई देशों की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। इसके लिए सभी डोनाल्ड ट्रंप को दोषी ठहरा रहे हैं यहां तक कि अमेरिका में भी ट्रंप का विरोध हो रहा है। ट्रंप भले ही ईरान को जंग की धमकी दे रहे हैं लेकिन वो जानते हैं कि जंग से अमेरिका को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। यही वजह है कि उन्होंने चीन से अपने आपसी मतभेद भूलाकर शी जिनपिंग के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है क्योंकि चीन ही है जो ईरान का सबसे बड़ा मददगार है।
शी जिनपिंग भी जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप को घुटनों पर लाने का यही सही समय है और उन्होंने इसका पूरा फायदा भी उठाया। उन्होंने होर्मूज खुलवाने में मदद करने का आश्वासन इस शर्त पर दिया कि अमेरिका ताईवान को भूल जाए। उन्होंने दो टूक शब्दों में ट्रंप को चेतावनी दे दी कि अगर चीन और ताईवान विवाद में अमेरिका ने दखलंदाजी की तो चीन और अमेरिका के संबंध बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाएंगे। शी जिनपिंग ने ऐसी चेतावनी देकर अमेरिका को उसकी औकात दिखा दी। यही नहीं बल्कि डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका यात्रा के दौरान उनकी बेइज्जती करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। डोनाल्ड ट्रंप का स्वागत करने वे खुद एयरपोर्ट नहीं गए बल्कि उप राष्ट्रपति को भेज दिया। द्विपक्षीय बातचीत में भी शी जिनपिंग खुद को डोनाल्ड ट्रंप को कमतर आंकते रहे।
डोनाल्ड ट्रंप के मुंह से उन्होंने यह भी कबूल करा लिया कि शी जिनपिंग एक महान नेता हैं लेकिन खुद उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ नहीं की। बहरहाल डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत से यह उम्मीद बंधी है अब होर्मूज संकट का समाधान निकल सकता है। भले ही अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर जल्द कोई समझौता न हो पाए लेकिन होर्मूज पर ईरान की नाकेबंदी अगर खत्म हो जाती है तो इससे अमेरिका राहत की सांस लेगा क्योंकि इस नाकाबंदी के कारण ही डोनाल्ड ट्रंप की छवि खलनायक वाली बन गई है।
अब देखना होगा कि चीन इसके लिए ईरान को मनाने में सफल होता है या नहीं। इस बीच भारत में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हो रहा है जिसमें ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी शामिल हुए हैं। और उनकी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ भी बातचीत हुई है। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित जंग के बीच ईरानी विदेश मंत्री की भारत यात्रा वैश्विक उथल पुथल के बीच महत्वपूर्ण हो जाती है।
अराघची ने सदस्य देशों से अपील की है कि अंतराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लघंन करने वालों की निंदा की जानी चाहिए। जाहिर है उन्होंने अमेरिका को ब्रिक्स सम्मेलन के माध्यम से संदेश देने की कोशिश की है और भारत तथा ईरान की बेहतर संबंधों की वकालत की है ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन की शरण में पहुंचे हैं तब ईरान के विदेश मंत्री का भारत आना और दोनों देशो के बीच पुराने संबंधों को और मजबूत बनाने की बात करना अमेरिका और चीन के लिए सोच का विषय हो सकता है।
होमूर्ज को खुलवाने के लिए हालांकि अमेरिका ने भारत से कोई अनुरोध किया है लेकिन इस मामले में भारत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है क्योंकि उसके ईरान के साथ मधुर संबंध रहे हैं। यदि पाकिस्तान की तरह चीन भी ईरान को होर्मूज खोलने के लिए राजी नहीं कर पाता है तो संभवत: दुनिया पर गहराते तेल और गैस संकट के समाधान के लिए भारत इस दिशा में पहल कर सकता है। बहरहाल चाहे कोई भी मध्यस्थता करे लेकिन होर्मूज की नाकेबंदी हटना बेहद जरूरी है ताकि आधी दुनिया में गहराते तेल और गैस संकट का समाधान हो सके।
