Editorial: एक समय था जब भारत शिक्षा का केन्द्र हुआ करता था। यहाँ की गुरू शिष्य परंपरा की पूरे विश्व में सराहना होती थी। समय बदला और अंग्रेजी शासन काल में गुरुकुलों को बंद कर मैकाले शिक्षा पद्धति लागू की गई। जिसका उद्देश्य ही भारतीय शिक्षा पद्धति की समाप्ति थी। आजादी के बाद भी यह अंग्रेजी द्वारा खींची गई लकीर के हम फकीर बने रहे। नई शिक्षा नीति बनी लेकिन उसमें इतनी विसंगतियां रही जो आजादी के सात दशकों बाद भी दूर नहीं की जा सकी। इन्हीं खामियों का अनुचित लाभ उठाने के लिए 90 के दशक से कोचिंग सेन्टरों का प्रादुर्भाव हुआ।
आज स्थिति यह है कि न सिर्फ महानगरों और शहरों में बल्कि गांव कसबों में भी कुकुरमुत्तों की तरह कोचिंग सेन्टर उगते आ रहे हैं। जो छात्रों को सुनहरे भविष्य का सपना परोसकर चांदी काट रहे हैं। अब तो ऑनलाइन कोचिंग क्लास का नया गोरखधंधा शुरू हो गया है। स्वनामधारी कथित सर और मैडम इससे मोटा माल कमा रहे हैं। भले ही गंदा है पर उनका यह धंधा दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि बहुत से ऐसे सेवा भावी शिक्षक नि:शुल्क ऑनलाइन कोचिंग दे रहे हैं और उससे लाखों गरीब छात्र लाभान्वित हो रहे हैं जो तथाकथित बड़े कोचिंग सेंट्ररो की मोटी फीस नहीं भर पाते लेकिन यह भी सच है कि अधिकांश कोचिंग सेंटर लूट का केंद्र बन गए हैं। वास्तव में यह एजुकेशन माफिया है जिन्होंने पूरे एजुकेशन सिस्टम को हाईजैक करके रख लिया है।
अभी नीट परीक्षा के पेपर लीक का जो मामला सामने आया है और इसके लिए जिम्मेदार जिन लोगों की गिरफ्तारी हुई है उन सभी के तार किसी न किसी कोचिंग सेंटर से जुड़े पाए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि शिक्षा के नाम पर कितना बड़ा खेला हो रहा है और वह भी ठीक सरकार की नाक के नीचे इससे यह बात भी दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ नजर आती है कि एजुकेशन माफिया की पीठ पर सत्ताधारी पार्टियों के बड़े नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाहों का हाथ होता है।
कोचिंग के नाम पर शिक्षा का व्यापार करने और अधकचरा ज्ञान देने वाले इन एजुकेशन माफियाओं ने अब तो कोचिंग इंडस्ट्रीज ही खड़ी कर दी है जिसका सालाना कारोबार लगभग पचास हजार करोड रुपए हो गया है। इसमें भी हर साल 10 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है यह बात समझ से परे है कि जिस देश में हजारों लाखों सरकारी और निजी शिक्षण संस्थान हो और सरकार यहां दावा करते नहीं थकती की सरकारी शिक्षण संस्थानों में उत्कृष्ट शिक्षा दी जाती है।
वहां कोचिंग सेंटरों की जरूरत ही क्यों पड़ रही है? पड़ोसी देश नेपाल में तो वहां की नई सरकार ने सभी कोचिंग सेंटर को बंद कर दिया है। किंतु भारत में कॉकरोच की तरह कोचिंग सेंटरों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है। जो भ्रामक और फर्जी दावे करते हैं और झूठे आश्वासन देकर मासूम छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं और उनके अभिभावकों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। एक खबरिया चैनल पर जब इन कोचिंग सेंटरों की कारगुजरियां उजागर की गई तो पूरा एजुकेशन माफिया बौखला गया। खुद को गुणों की खान समझने वाले एक कथित सर ने तो उक्त न्यूज़ एंकर की काबिलियत पर ही बड़े अपमानजनक ढंग से सवालिया निशान लगा दिए।
जिस सर को बात करने की तमीज ही ना हो और जो सड़क छाप गुंडो की भाषा बोलने से भी गुरेज ना करता हो वह छात्रों को कैसी शिक्षा देता होगा और बच्चे ऐसे अहमकों से क्या ही सिखते होंगे? दरअसल यह एजुकेशन माफिया ऐसे घुन है जो देश के पूरे एजुकेशन सिस्टम को खोखला कर रहे हैं। ऐसे लोगों को उक्त न्यूज़ एंकर को दो कौड़ी का नहीं बोलना चाहिए था। जो लोग शिक्षा की दुकान चलाकर करोड़ों रुपए की काली कमाई कर रहे हों वे भला कैसे दो कौड़ी के हो सकते हैं।
बहरहाल अब जबकि कोचिंग सेंटरों की उपयोगिता को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ ही चुकी है तो इस पर अब सरकार को भी ध्यान देना चाहिए कि क्या कुछ कोचिंग सेंटर वाले सुनियोजित रूप से जेहादी सोच और वामपंथी एजेंट को आगे बढऩे का काम तो नहीं कर रहे हैं। इन कोचिंग सेंटर वालों की काली कमाई की भी जांच होनी चाहिए। जो सही मायनों में में शिक्षक हंै और निस्वार्थ भावना से यूट्यूब के जरिए गरीब और जरूरतमंद छात्रों को निशुल्क कोचिंग दे रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन जो लोग कोचिंग के नाम पर लूट मचा रहे हैं और एजुकेशन सिस्टम पर हावी होते जा रहे हैं।
पेपर लीक करने के मामले में संदिग्ध भूमिका निभा रहे हैं उनके खिलाफ तो उच्च स्तरीय जांच करा कर ऐसे एजुकेशन माफिया के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही भी की जानी चाहिए। छात्रों के अभिभावकों को भी चाहिए कि वह इन कथित सरों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम के जाल में न फंसे। ऐसे कोचिंग सेंटर कि पहले ठोक बजा कर जांच पड़ताल कर के उसके बाद ही इसमें अपने बच्चों को भेजें।
