Soil Health Campaign India : यूरिया के ‘ओवरडोज’ से आईसीयू में पहुंची मिट्टी, बेतहाशा रासायनिक खाद से जहरीला हो रहा भूजल

देश में खेती की सबसे बड़ी समस्या अब खाद की कमी नहीं, बल्कि उसका गलत और असंतुलित इस्तेमाल है। खेतों में जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने के कारण मिट्टी की सेहत लगातार बिगड़ रही है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सरकार को मिट्टी बचाने के लिए विशेष अभियान शुरू करना पड़ा है। सोमवार से शुरू हुआ ‘खेत बचाओ अभियान’ इसी चिंता का नतीजा है।

कृषि विशेषज्ञों की 1650 से अधिक टीमें ‘कम खाद, सही खाद और सही सलाह’ के नारों के साथ गांव-गांव जाएंगी। किसानों को समझाना है कि अधिक खाद का मतलब अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि मिट्टी के साथ-साथ सेहत का भी नुकसान होता है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फसलों को संतुलित पोषण देने के लिए खेतों में नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) एवं पोटाश (K) का अनुपात $4:2:1$ होना चाहिए। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात $9.3:3.5:1$ तक पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब है कि किसान बेतहाशा नाइट्रोजन आधारित उर्वरक, खासकर यूरिया डाल रहे हैं।

इसका सबसे बड़ा कारण यूरिया की सस्ती उपलब्धता है। केंद्र सरकार यूरिया पर हर साल पौने दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की सब्सिडी देती है, जिससे इसकी कीमत काफी कम रहती है। किसान हरियाली एवं फसल की तेज वृद्धि देखकर संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन लंबे समय में यही आदत मिट्टी को जहरीला बना देती है।

राज्यों में चिंताजनक हालात, घट रहा जैविक कार्बन

कई राज्यों में स्थिति बेहद चिंताजनक है। पंजाब और हरियाणा में एनपीके (NPK) अनुपात मानकों से कई गुना अधिक हो चुका है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड एवं राजस्थान में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, जहां पोषण प्रबंधन की जगह सिर्फ यूरिया आधारित खेती हावी होती जा रही है।

इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है। रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते दबाव से मिट्टी में जैविक कार्बन घट रहा है। इसके साथ ही जिंक, सल्फर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी हो रही है। हताशा में किसान खाद की मात्रा लगातार बढ़ाते जा रहे हैं, फिर भी उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। यानी खेती की लागत बढ़ रही है और लाभ घट रहा है।

भूजल हो रहा दूषित, वैज्ञानिक देंगे सही सलाह

अधिक यूरिया का असर सिर्फ खेत की मिट्टी तक ही सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा हिस्सा मिट्टी में नीचे रिसकर भूजल (Groundwater) तक पहुंच जाता है। इससे पानी में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ रही है, जो पेयजल को गंभीर रूप से दूषित कर रहा है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ अब मिट्टी के अस्तित्व को बचाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

खेत बचाओ अभियान के तहत कृषि वैज्ञानिक और राज्य सरकारों की टीमें गांव-गांव पहुंचेंगी। इस दौरान किसानों को मिट्टी परीक्षण (Soil Testing), संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खाद और फसल की जरूरत के अनुसार पोषण प्रबंधन की कड़क जानकारी दी जाएगी। साथ ही खेत बचाने के साथ-साथ उर्वरकों पर हो रहे बेतहाशा खर्च को कम करने के प्रति भी जागरूक किया जाएगा।

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