देवेंद्र किशोर गुप्ता
(School management is now in the hands of parents) छत्तीसगढ़ में स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC) में हुए हालिया बदलाव को शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन माना जा रहा है। पहले कई विद्यालयों में सांसद प्रतिनिधि, विधायक प्रतिनिधि या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका अध्यक्ष पद पर दिखाई देती थी, लेकिन अब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष केवल विद्यार्थियों के अभिभावकों में से चुने जाएंगे। पहली नजर में यह फैसला शिक्षा व्यवस्था को अधिक जनभागीदारी आधारित बनाने वाला प्रतीत होता है, लेकिन इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि विद्यालयों की निगरानी और निर्णय प्रक्रिया में सीधे उन लोगों की भागीदारी बढ़ेगी जिनके बच्चे वहां पढ़ते हैं। इससे स्कूलों की वास्तविक समस्याएं जैसे शिक्षकों की कमी, भवन, पेयजल, शौचालय, मध्यान्ह भोजन और पढ़ाई की गुणवत्ता अधिक मजबूती से उठाई जा सकेंगी।
अभिभावकों को अधिकार मिलने से जवाबदेही भी बढ़ेगी और विद्यालयों पर समुदाय का स्वामित्व मजबूत होगा। दूसरी ओर, जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित होने से कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। विधायक या सांसद प्रतिनिधियों के पास प्रशासनिक पहुंच, संसाधन जुटाने की क्षमता और अधिकारियों पर प्रभाव होता था, जिससे कई बार स्कूलों (School management is now in the hands of parents) की समस्याओं का समाधान तेजी से हो जाता था। अब यह जिम्मेदारी उन अभिभावकों के हाथ में होगी जिनके पास जरूरी नहीं कि प्रशासनिक अनुभव या प्रभाव हो। इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। यदि विद्यालय प्रबंधन कोई गलत निर्णय लेता है या किसी मुद्दे पर विरोध की आवश्यकता पड़ती है, तो क्या हर अभिभावक पूरी निर्भीकता से स्कूल प्रबंधन के खिलाफ खड़ा हो पाएगा?
आखिर उसका बच्चा उसी विद्यालय में पढ़ रहा होगा। स्वाभाविक रूप से उसके मन में यह चिंता बनी रह सकती है कि कहीं उसके विरोध का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव उसके बच्चे पर न पड़ जाए। भले ही वास्तविकता में ऐसा कुछ न हो, लेकिन यह आशंका स्वयं में एक दबाव पैदा करती है। यहीं पर एक अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। क्या एक पिता अपने बच्चे के भविष्य की चिंता से मुक्त होकर उतनी ही मजबूती से लड़ पाएगा, जितना कोई बाहरी प्रतिनिधि लड़ सकता था? विद्यालय प्रबंधन और अभिभावक के बीच कोई खुला टकराव दिखाई न दे, फिर भी एक अनकही दूरी और मनोवैज्ञानिक असहजता पैदा हो सकती है।
कई अभिभावक संघर्ष का रास्ता चुनने के बजाय अपने बच्चे की पढ़ाई और भविष्य को ध्यान में रखते हुए चुप रहना अधिक सुरक्षित समझ सकते हैं। सरकार की दृष्टि से समर्थक इसे स्कूलों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने की दिशा में कदम बताएंगे, जबकि आलोचक कहते है कि राजनीति खत्म नहीं होगी, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाएगा। स्थानीय प्रभावशाली लोग अब भी अपने समर्थक अभिभावकों को समिति में प्रभावी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।
कुल मिलाकर यह बदलाव “नेता आधारित प्रतिनिधित्व” से “अभिभावक आधारित भागीदारी” की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है। यह प्रयोग सफल भी हो सकता है और चुनौतियां भी पैदा कर सकता है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अभिभावक कितनी स्वतंत्रता और आत्मविश्वास के साथ अपनी भूमिका निभा पाते हैं तथा विद्यालय प्रबंधन उनके सुझावों और आपत्तियों को कितनी सकारात्मकता से स्वीकार करता है। शिक्षा में जनभागीदारी का यह मॉडल निश्चित रूप से नया अवसर लेकर आया है, लेकिन इसके साथ कुछ ऐसे सवाल भी जुड़े हैं जिनका जवाब समय ही देगा।
