RTE Supreme Court Verdict : आरटीई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, प्राइवेट स्कूलों को मानना ही होगा सरकार का आदेश

शिक्षा के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो देश के हजारों गरीब बच्चों के भविष्य की राह रोशन कर देगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर सरकार ने किसी बच्चे का नाम प्राइवेट स्कूल के लिए तय कर दिया है, तो स्कूल प्रबंधन उसे दाखिला देने से मना नहीं कर सकता।

अक्सर देखा जाता था कि बड़े प्राइवेट स्कूल तकनीकी कमियों का हवाला देकर गरीब बच्चों को बैरंग (RTE Supreme Court Verdict) लौटा देते थे, लेकिन अब कोर्ट की इस सख्ती के बाद स्कूलों की मनमानी पर पूरी तरह लगाम लग गई है। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि उन मां-बाप की उम्मीदों की जीत है जो अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में पढ़ते देखना चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा देना कोई खैरात नहीं, बल्कि एक संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने लखनऊ पब्लिक स्कूल की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि शिक्षा का अधिकार जो संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत मौलिक अधिकार है, उसे केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अगर स्कूल देरी करेंगे या बहाने बनाएंगे, तो यह राष्ट्रीय मिशन विफल हो जाएगा। यहां गांव और शहर के हर उस बच्चे के लिए न्याय की बात की गई है जो संसाधनों की कमी के कारण पीछे छूट जाता था।

स्कूल सरकार की सूची को मानने के लिए मजबूर (RTE Supreme Court Verdict)

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीइ) के तहत गरीब बच्चों के निजी स्कूलों में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने के अधिकार पर मुहर लगाई है। कोर्ट ने कहा कि आरटीइ कानून के तहत आस-पड़ोस के स्कूल राज्य सरकार की ओर से भेजे गए छात्र को बिना किसी देरी के प्रवेश देने को बाध्य हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह एक राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने लखनऊ पब्लिक स्कूल की अपील खारिज करते हुए बच्चे को प्रवेश देने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को उचित ठहराया है।

मौलिक अधिकार को कोरा वादा नहीं बनने देंगे

डा. पीएस नरसिम्हा और डा. आलोक अराधे की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इन्कार कर दिया। अपने फैसले में पीठ ने कहा कि स्कूल को उस छात्र को प्रवेश देना अनिवार्य है जिसका नाम सरकार की ओर से भेजी गई सूची में शामिल है।

कोर्ट ने कहा कि वह पड़ोस के स्कूल के उस संवैधानिक और वैधानिक दायित्व को दोहराते हैं कि वे राज्य सरकार द्वारा भेजे गए छात्रों को तुरंत प्रवेश दें। यदि आरटीई कानून के निर्देशों को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू नहीं किया जाएगा, तो शिक्षा का अधिकार जो अनुच्छेद 21ए के तहत मौलिक अधिकार है, वह महज एक कोरा वादा बनकर रह जाएगा।

समानता और सामाजिक बदलाव का जरिया (RTE Supreme Court Verdict)

कोर्ट ने कहा कि यह एक सोची समझी वैधानिक परिकल्पना है, जिसका उद्देश्य बच्चे के शुरुआती वर्षों के दौरान समानता और सामाजिक एकीकरण को व्यावहारिक (RTE Supreme Court Verdict) रूप देना है।

यह कानून स्कूलों के लिए अनिवार्य करता है कि वे अपनी कक्षा की कुल क्षमता के कम से कम 25 प्रतिशत तक समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को प्रवेश दें। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता जैसे स्कूलों को सरकार के चयन पर कुछ असहमति हो सकती है, वे अधिकारियों के सामने पक्ष रख सकते हैं, लेकिन उन्हें परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना छात्र को प्रवेश देना अनिवार्य है।

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