नाबालिगों से जुड़े एक चर्चित मामले को लेकर शुक्रवार को न्यायिक गलियारों में काफी (POCSO Case) चर्चा रही। अदालत परिसर के बाहर भी इस फैसले को लेकर लोगों के बीच अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों की नजर इस बात पर टिकी थी कि शीर्ष अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या पहले से मिली राहत पर कोई असर पड़ता है।
सुबह से ही कानूनी हलकों में हलचल बनी रही। मामले से जुड़े पक्षों की दलीलों को लेकर चर्चाएं होती रहीं। सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों पर भी सबकी नजर रही और अंततः जो फैसला सामने आया उसने पहले दिए गए आदेश को बरकरार रखते हुए विवाद पर नई बहस छेड़ दी।
सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें पोक्सो अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अग्रिम जमानत प्रदान की गई थी।
याचिका को मिली अस्वीकृति : POCSO Case
जस्टिस एमएम सुंद्रेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी की ओर से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा गया था कि आरोपों की गंभीरता पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
आरोपों की गंभीरता का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि शिक्षा देने के नाम पर नाबालिगों के साथ कथित यौन शोषण किया गया। दलील दी गई कि पोक्सो कानून के अंतर्गत यह अत्यंत गंभीर प्रकृति का अपराध माना जाता है और इस पहलू पर अधिक गहराई से विचार होना चाहिए था।
हाई कोर्ट के आदेश पर उठाए गए सवाल
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि हाई कोर्ट ने मामले का निपटारा पर्याप्त परीक्षण के बिना कर दिया। याचिकाकर्ता पक्ष ने दावा किया कि उपलब्ध तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया।
अदालत ने पूछा देरी का कारण
सुनवाई के दौरान पीठ ने शिकायतकर्ता से यह भी जानना चाहा कि यदि नाबालिगों के कथित शोषण की जानकारी पहले से थी तो पुलिस के पास पहुंचने में इतना विलंब (POCSO Case) क्यों हुआ। इस मुद्दे पर अदालत ने सवाल उठाते हुए मामले में दखल देने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह इस प्रकरण में हस्तक्षेप नहीं करेगी और इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।
