PM’s appeal to the youth: 2036 में होने जा रहे ओलंपिक की तैयारियों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने युवाओं और खिलाडिय़ों से वर्चुअल संवाद करते हुए ठीक ही कहा है कि युवाओं को मोबाइल स्क्रिन से अधिक प्लेग्राउंड पर सक्रिय रहना चाहिए, तभी भारत ओलंपिक में पदक हासिल करने में सफल हो पाएगा। वास्तव में आज का युवा ही नहीं बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी मोबाइल की लत का शिकार हो चुके हैं। दैनिक नवप्रदेश ने दो सप्ताह पूर्व ही बचपन को मोबाइल से मुक्त करने नवाचार किया था और मोबाइल से बच्चों को दूर रखने की जरूरत पर जोर दिया था।
उसमें शामिल बच्चों ने एक चौकाने वाला तथ्य उजागर किया था कि आज कल तो स्कूल वाले भी विधार्थियों को होमवर्क मोबाइल पर देते हैं। नतीजतन बच्चों को मोबाइल देखना ही पड़ता है। जब एक बार होमवर्क के नाम पर मोबाइल उनके हाथों में आता है तो फिर वे उसमें कार्टून, गेम्स, इंस्टाग्राम, रील्स आदि देखते हैं। मेटा ने तो १८ से कम उम्र के बच्चों के लिए दिनभर में सिर्फ २ घंटे का ही लिमिट तय किया है, ताकि बच्चे अन्य एक्टिविटी पर ज्यादा ध्यान दें। खेलकूद में भाग लें, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहे।
अधिक मोबाइल देखने की वजह से बच्चों के दिल और दिमाग पर तो विपरीत प्रभाव पड़ता ही है उनकी आंखों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। कई बच्चों को इसी वजह से कम उम्र में ही चश्मा लगाने की नौबत आ चुकी है। इसके बावजूद आज बच्चे और युवा घंटों मोबाइल से चिपके रहते हैं। प्ले ग्राउंड खाली पड़े रहते हैं। युवा मोबाइल पर ही गेम खेलने पर व्यस्त रहते हैं। इस बारे में अब गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस चीन ने तरह-तरह के एप्प बनाकर भारतीय बच्चों को मोबाइल की गंदी लत का शिकार बनाया है, उसी चीन ने अब अपने देश में बच्चों के मोबाइल देखने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
अब चीन के बच्चे मोबाइल पर गेम नहीं खेलते, बल्कि प्लेग्राउंड में जाकर पसीना बहाते हैं। इसी वजह से चीन बेहतर प्रदर्शन कर पाता है। अन्य क्षेत्रों में भी चीन लगातार आगे बढ़कर रहा है। भारत में भी बच्चों और युवाओं को मोबाइल के अत्याधिक उपयोग की वजह से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए ेऐसे ही कड़े कदम उठाने की सख्त जरूरत बड़ी सिद्दत से महसूस की जा रही है। इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चिंता स्वाभाविक है और उन्हीं से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे बच्चों को मोबाइल का गुलाम बनने से बचाने के लिए कारगर पहल करें। खासतौर पर स्कूलों के लिए कड़े निर्दश जारी हों कि वे छात्रों को मोबाइल पर होमवर्क देना तत्काल बंद करें। जब तक इस पर कड़ाईपूर्वक रोक नहीं लगेगी तब तक बच्चों के हाथों से मोबाइल नहीं छूटेगा।
