पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के संकट और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया की चिंता (NSA Ajit Doval Riyadh Visit 2026) बढ़ा दी है। ऐसे नाजुक वक्त में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल अचानक सऊदी अरब की राजधानी रियाद पहुंचे हैं।
रविवार को हुई इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद अब वैश्विक गलियारों में भारत की नई रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। डोभाल की इस यात्रा को भारत की उस ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ का हिस्सा माना जा रहा है, जो खाड़ी देशों में शांति और भारतीय हितों की सुरक्षा के लिए शुरू की गई है।
पाकिस्तान का दांव फेल, अब भारत ने संभाली कमान (NSA Ajit Doval Riyadh Visit 2026)
यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि हाल ही में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिश की थी, जो पूरी तरह विफल रही। पाकिस्तान में हुई बातचीत बेनतीजा रहने के बाद अब भारत ने अपने पुराने और भरोसेमंद सहयोगी सऊदी अरब के साथ मिलकर नई बिसात बिछाई है।
अजीत डोभाल ने सऊदी के विदेश मंत्री फैजल बिन फरहान और ऊर्जा मंत्री अब्दुलअजीज बिन सलमान के साथ बंद कमरे में लंबी चर्चा (NSA Ajit Doval Riyadh Visit 2026) की। इस चर्चा का मुख्य केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ता तनाव और उसके चलते तेल की कीमतों पर पड़ने वाला असर बताया जा रहा है।
खाड़ी में बसे भारतीयों की सुरक्षा है सर्वोच्च प्राथमिकता
सऊदी अरब के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुसाइद अल-ऐबान के साथ हुई बैठक में डोभाल ने स्पष्ट किया कि खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिक भारत सरकार की पहली प्राथमिकता हैं।
संघर्ष की स्थिति में उनकी सुरक्षा और वहां से व्यापारिक रास्तों को बहाल रखना भारत के लिए बेहद (NSA Ajit Doval Riyadh Visit 2026) जरूरी है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को एक नए रणनीतिक स्तर पर ले जाने के लिए कई अहम समझौतों पर भी विचार-विमर्श किया गया।
क्या बदल जाएगी पश्चिम एशिया की तस्वीर?
भारत की यह सक्रियता बताती है कि नई दिल्ली अब केवल मूकदर्शक बनकर रहने के मूड में नहीं है। डोभाल का रियाद दौरा यह संकेत है कि भारत मिडिल-ईस्ट के अपने सहयोगियों के साथ मिलकर क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए खुद रणनीति तैयार (NSA Ajit Doval Riyadh Visit 2026) कर रहा है। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई तक, भारत और सऊदी अरब की यह जुगलबंदी आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़े बदलाव ला सकती है।
