संपादकीय: ममता के अपने हुए पराये


Editorial: वाकई राजनीति बड़ी निर्मम होती है जब तक कोई सत्ता में रहता है तो बेगाने भी उसके अपने बन जाते हैं और सत्ता से बाहर होते ही उनके अपने भी पलक झपकते ही पराये हो जाते हैं। बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी की हार के बाद वहां की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमों ममता बनर्जी की हालत आज ऐसी हो गई है कि एक माह पूर्व तक उनके साथ जो हजारों की भीड़ चलती थी और उनके साथ चलने में गर्व महसूस करती थी वह अब उनके साथ चलने में शर्म महसूस करने लगी है।

नतीजतन अब भीड़ पूरी तरह छट गई है। उन्होंने टीएमसी में उठी बगावत की आंधी को मद्देनजर रखकर अपने घर पर सभी विधायकों और सांसदों की बैठक बुलाई तो उसमें मात्र छह सांसद और आठ विधायक ही पहुंचे जबकि टीएमसी के कम से कम 20 विधायक तो अभी भी उनके साथ होने का दावा किया जा रहा है। वहीं लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर टीएमसी के 41 सांसद हैं लेकिन ममता बनर्जी के बुलावे पर सिर्फ छह सांसद पहुंचे और इनमें भी एक उनका भतीजा अभिषेक बनर्जी है। इसका मतलब यह कि अब उनके साथ सिर्फ पांच सांसद ही बचे हैं। इसी से स्पष्ट है कि टीएमसी में बगावत की आंधी अब प्रचंड तूफान के रूप में तब्दील होती जा रही है।

ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने का मन बना चुकी है क्योंकि अब बंगाल में उनके लिए करने को कुछ नहीं रखा है। राष्ट्रीय राजनीति में जाने के लिए जरूरी है कि वे लोकसभा या राज्यसभा की सदस्य बने। टीएमसी के 60 विधायकों के अलग गुट बनाने के बाद अब उनके राज्य सभा में जाने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। ऐसे में लोकसभा में जाने के लिए उन्हें टीएमसी के किसी एक सांसद से इस्तीफा दिलाना होगा और वह भी ऐसा सांसद जो मुस्लिम बहुल लोकसभा सीट से जीता हो ताकि ममता बनर्जी आसानी से चुनाव जीत सके। इसके लिए उन्होंने पूर्व क्रिकेटर युसूफ पठान से बहरामपुर लोकसभा सीट से इस्तीफा देने को कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। जिस युसूफ पठान को ममता बनर्जी ने गुजरात से बुलाकर अपने दम पर बंगाल से सांसद बनाया आज वो भी ममता बनर्जी के लिए अपनी सीट खाली करने को तैयार नहीं है।

ऐसे में कोई और वरिष्ठ सांसद ममता बनर्जी के लिए अपनी लोकसभा सीट छोड़ेगा ऐसी संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आ रही है। ममता बनर्जी के सामने एक ही विकल्प बचता है कि वे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी से डॉयमंड हार्बर लोकसभा सीट खाली करवा दें और वहां से उपचुनाव लड़ें। किन्तु यहां से भी शायद ही अभिषेक बनर्जी इस्तीफा देने को तैयार हो यदि हो भी गये तो वहां बुआ भतीजे के खिलाफ जो भारी असंतोष है उसे देखते हुए ममता बनर्जी की जीत की कोई गारंटी नहीं होगी।

यदि वे वहां से लोकसभा चुनाव हार गई तो उनके लिए यह और भी बड़ा झटका होगा। जिससे वे कभी उबर नहीं पाएंगी और केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय होने का उनका सपना भी चकनाचूर हो जाएगा। वैसे भी इंडी गठबंधन में ममता बनर्जी को अब उतना महत्व नहीं मिलेगा। इस बीच जिस हुमांयू कबीर को ममता बनर्जी ने टीएमसी से हकाल दिया था और उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाकर ममता बनर्जी को अपनी ताकत दिखा दी थी उन्होंने ममता बनर्जी के जले पर नमक छिड़कते हुए यह ऑफर दिया है कि वे चाहे तो हुमांयू कबीर की एक विधानसभा सीट रेजी नगर से चुनाव लड़ सकती हैं। वे वहां से अपनी पार्टी का उम्मीदवार खड़ा नहीं करेंगे।

गौरतलब है कि हुमांयू कबीर ने दो सीटों से जीत दर्ज की थी जिसमें से एक उन्हें छोडऩा है। हुमांयू कबीर ने ममता बनर्जी को ऑफर देकर यह साबित कर दिया कि भले ही ममता बनर्जी के अपने अब पराये हो गये हों लेकिन वे पराये होकर भी उनके अपने हैं। बहरहाल अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े संकट से गुजर रही ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी को बचाने और खुद अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए क्या रणनीति बनाती हैं और इसमें वे कितनी कामयाब हो पाती हैं।

Exit mobile version