पेट की आग बुझाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत करना जरूरी

सुशील शुक्ला

मुंगेली/नवप्रदेश। सरकार भले ही गरीब व मजदूर वर्ग के लिए रोजगार गारंटी और सस्ता चावल देने की योजना चला रही है, लेकिन अभी भी हजारों गरीब परिवार ऐसे हैं, जिनकी रोजी-रोटी हाड़ तोड़ मजदूरी पर ही चलती है। कुछ परिवारों को योजना का लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। रोज काम कर पेट की आग बुझाने वाले इन मजदूरों के आगे सूरज की आग भी कोई मायने नहीं रखती। हर सुबह उनको उस दिन परिवार का पेट भरने की चिंता सताती है। मजदूर दिवस क्या है यह भी वे नहीं जानते। वे जानते हैं तो बस इतना कि पेट की आग को बुझाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत करना जरूरी है। मजदूरों का कहना है कि धूप किसे नहीं लगती, लेकिन पेट पालने के लिए काम तो करना पड़ेगा। उनका कहना है कि तपती धूप में काम करे वही मजदूर कहलाता है।

मनरेगा का काम गांवों में चलता है फिर भी विभिन्न कारणों से ग्रामीण मजदूर शहर आकर दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करने मजबूर हैं। भीषण गर्मी में तापमान जहां एक ओर 45 डिग्री की ओर लगातार आगे बढ़ रहा है। सामान्य वर्ग के लोग गर्मी से बचने दोपहर में आराम कर रहे हैं। दूसरी ओर मजदूरों को तो बस पेट की आग बूझाने के लिए चंद रुपए की मजदूरी की आवश्यकता होती है। इसके लिए भोर की पहली किरण के साथ संघर्ष शुरू हो जाता है। शहर में गोल बाजार चैक में रोज सैकड़ों मजदूर गांव से आकर मजदूरी की तलाश करते काम में जुट जाते हैं।

जिले के ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों को भी रोजगार गारंटी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। काम अगर मिल भी रहा है तो मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। ऐसे में वे शहर की ओर काम की तलाश में भाग रहे हैं और ठेकेदारों के अंडर में 250-300 रुपए रोजी में काम करने को मजबूर हैं। नगर के मजदूरों ने बताया कि महंगाई के जमाने में एक-दो सदस्य के काम करने पर परिवार का गुजारा नहीं हो पाता, इसलिए महिलाएं भी रेजा का काम करती है।

इस काम से उसे 250 रुपए मिल जाते हैं। राजकुमार ने बताया कि रोजगार गारंटी में नियमित काम नहीं मिलता और भुगतान में भी विलंब होता है। इसलिए वह शहर में आकर मेहनत मजदूरी करते हैं। हालांकि ठेकेदार के अंडर में काम करने में मेहनत अधिक लगता है पर पैसे समय पर मिल जाते हैं, जिससे घर में बच्चों को दो वक्त भरपेट भोजन मिल पाता है।

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