राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर में कांग्रेस ने अपने संगठन को नए ढंग से खड़ा करने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी अब केवल चुनावी रैलियों और बड़े चेहरों के भरोसे राजनीति नहीं करना चाहती, बल्कि बूथ स्तर तक वैचारिक और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की नई फौज तैयार करने की दिशा में काम कर रही है। इसी रणनीति के तहत “संगठन सृजन मॉडल” के माध्यम से दिल्ली और राजस्थान के 100 जिला अध्यक्षों को 10 दिनों तक विशेष राजनीतिक और संगठनात्मक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
23 मई से 1 जून तक चल रहे इस प्रशिक्षण शिविर में जिला अध्यक्षों को चुनाव प्रबंधन, जनसंवाद, संगठन संचालन, सोशल मीडिया रणनीति, नेतृत्व क्षमता और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने जैसे विषयों की गहन जानकारी दी जा रही है। राहुल गांधी के रणनीतिक सलाहकार सचिन राव सहित कई वरिष्ठ नेता इन सत्रों का संचालन कर रहे हैं।
यह शिविर केवल भाषणों और बैठकों तक सीमित नहीं रखा गया है। जिला अध्यक्षों को गांवों में रात्रि प्रवास, श्रमदान, मनरेगा कार्यों का निरीक्षण और आम लोगों के बीच रहकर संवाद स्थापित करने जैसी गतिविधियों से भी जोड़ा गया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इससे नेताओं और कार्यकर्ताओं में जमीन से जुड़ाव मजबूत होगा और संगठन में अनुशासन तथा सामूहिक कार्य संस्कृति विकसित होगी।
कांग्रेस नेतृत्व को अब यह एहसास हो चुका है कि आने वाले चुनावों में केवल बड़े राजनीतिक नारों से सफलता नहीं मिलेगी। पार्टी को बूथ स्तर पर सक्रिय, प्रशिक्षित और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की जरूरत होगी। इसी सोच के तहत कांग्रेस अब संगठन को नई संरचना देने में जुटी है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि संगठन सृजन अभियान कांग्रेस के विचार, संघर्ष और संगठन को नई ऊर्जा देने की दिशा में बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण शिविर के माध्यम से कार्यकर्ताओं को पार्टी की विचारधारा और जनता के मुद्दों के साथ मजबूती से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी अंदरूनी गुटबाजी बनी हुई है। राजस्थान कांग्रेस लंबे समय से अलग-अलग खेमों में बंटी नजर आती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के बीच संगठनात्मक फैसलों को लेकर लगातार खींचतान की स्थिति रही है। जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों से लेकर संगठन विस्तार तक इस गुटबाजी का असर खुलकर दिखाई देता रहा है।
इसी वजह से पुष्कर शिविर को केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता की कवायद भी माना जा रहा है। पार्टी ने सभी वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग सत्र रखे हैं ताकि कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश जाए कि कांग्रेस नेतृत्व एक मंच पर खड़ा है और आगामी चुनावों के लिए संयुक्त रणनीति पर काम कर रहा है।
कांग्रेस के इतिहास में यह प्रयोग इसलिए भी अलग माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले प्रशिक्षण शिविर सामान्यतः दो या तीन दिन के होते थे। पहली बार जिला अध्यक्षों को लगातार 10 दिनों तक एक साथ रखकर राजनीतिक, वैचारिक और व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जमीन पर बैठकर चर्चा करना, स्वयं अपनी जिम्मेदारियां निभाना और गांवों में लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याएं समझना इस शिविर की प्रमुख विशेषताएं हैं।
पार्टी को उम्मीद है कि इस पहल का असर आने वाले निकाय और पंचायत चुनावों में दिखाई देगा। कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति भी इसी प्रशिक्षण के माध्यम से तैयार कर रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह 10 दिवसीय मंथन कांग्रेस की पुरानी गुटबाजी को कम कर पाएगा और संगठन को नई दिशा दे पाएगा, या फिर यह प्रयास केवल एक सीमित संगठनात्मक अभ्यास बनकर रह जाएगा।
