छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट में हुई नियुक्तियों को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर अपना रुख साफ कर दिया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने उन याचिकाओं को सिरे से खारिज (Bilaspur High Court Verdict) कर दिया है, जिनमें चयन प्रक्रिया में हुए प्रशासनिक बदलावों को आधार बनाकर पूरी भर्ती को रद्द करने की मांग की गई थी।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों में कोई ऐसा मामूली बदलाव किया जाता है जो सभी उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू हो और जिससे किसी के साथ भेदभाव न हो, तो उसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला उन हजारों चयनित उम्मीदवारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जिनकी नियुक्तियां पिछले कुछ समय से कानूनी दांव-पेच में फंसी हुई थीं।
प्रश्नों की संख्या और चयन समिति का गठन (Bilaspur High Court Verdict)
मामला वर्ष 2022 का है, जब दुर्ग फैमिली कोर्ट में स्टेनोग्राफर और सहायक ग्रेड-3 के 14 रिक्त पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। इस भर्ती के खिलाफ खुशबू देवांगन, जितेंद्र कुमार और अन्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि विज्ञापन में परीक्षा के लिए 50 प्रश्न निर्धारित किए गए थे, लेकिन ऐन वक्त पर केवल 25 प्रश्न ही पूछे गए।
इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई थी कि परीक्षा से महज दो दिन पहले चयन समिति का पुनर्गठन (Bilaspur High Court Verdict) किया गया और प्रिंसिपल जज ने स्वयं को इसका अध्यक्ष नियुक्त कर लिया। याचिकाकर्ताओं ने इसे प्रक्रियात्मक गड़बड़ी बताते हुए पूरी चयन सूची को निरस्त करने की गुहार लगाई थी।
प्रशासनिक सुविधा बनाम चयन प्रक्रिया की वैधता
हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता से समीक्षा करने के बाद पाया कि भर्ती प्रक्रिया में किया गया बदलाव पूरी तरह तर्कसंगत था। अदालत ने गौर किया कि इस भर्ती के लिए लगभग 3,775 आवेदन प्राप्त हुए थे। इतनी बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की परीक्षा और मूल्यांकन को देखते हुए चयन समिति ने प्रश्नों की संख्या को कम करने का फैसला लिया था।
हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही प्रश्नों की संख्या कम की गई, लेकिन कुल अंक 100 ही रखे गए थे और यह नियम सभी परीक्षार्थियों के लिए एक समान था। कोर्ट ने माना कि जब कोई बदलाव सामूहिक रूप से लागू होता है और उससे किसी विशेष व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं होता, तो उसे चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।
असफल उम्मीदवारों के पास सवाल उठाने का अधिकार नहीं
अपने 42 पन्नों के विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत का उल्लेख (Bilaspur High Court Verdict) किया। कोर्ट ने कहा कि जो उम्मीदवार चयन प्रक्रिया की शर्तों को जानकर उसमें स्वेच्छा से शामिल होते हैं और अंततः असफल हो जाते हैं, उन्हें परिणाम आने के बाद प्रक्रिया की कमियों पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
इसके साथ ही, याचिकाकर्ताओं ने एक बड़ी तकनीकी चूक भी की थी, उन्होंने उन सफल उम्मीदवारों को पक्षकार नहीं बनाया था जिनकी नियुक्तियां इस याचिका के सफल होने पर प्रभावित होतीं। इन तमाम दलीलों और तथ्यों के आधार पर जस्टिस प्रसाद की बेंच ने नियुक्तियों को वैध मानते हुए सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
