हनीफ निजामी
भिलाई/नवप्रदेश। छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन की शुरुआत राजनांदगांव के बीएनसी मिल से हुई। ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने इसका नेतृत्व किया था। यही वजह है कि ठाकुर प्यारेलाल को श्रमिक आंदोलन का जनक कहा जाता है। 1920 में 36 दिनों तक चली पहली सफल हड़ताल ने मज़दूरों की 13 घंटे की कार्य अवधि कम करवाई। राजनांदगांव की बंगाल-नागपुर-कॉटन (बीएनसी) मिल में भीषण शोषण (13 घंटे काम) के खिलाफ ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवलाल मास्टर और शंकर खरे के नेतृत्व में शरू हुई हड़ताल को देश की सबसे लंबी हड़तालों में से एक माना जाता है।
नियोगी थे सबसे बड़े क्रांतिकारी नेता : नियोगी ने मजदूरों को आत्म-सम्मान और समान नागरिकता का भाव दिया। 1977 में छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ की स्थापना की। 1979 में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की स्थापना की गई। 1982 में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को राजनीतिक मोर्चा बनाया गया। बाद में जनकलाल ठाकुर डौंडीलोहारा विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी चुने गए।
दरअसल, सीएमएम का गठन क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान के लिए संघर्ष करने और श्रमिकों और किसानों की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से किया गया था।
सीएमएम ने शराब के दुरुपयोग के खिलाफ सामाजिक अभियान चलाए और श्रमिकों द्वारा वित्तपोषित अस्पताल जैसी सामाजिक परियोजनाएं शुरू कीं।
शहीद अस्पताल जैसे श्रमिक-नेतृत्व वाले संस्थानों की स्थापना और शराब विरोधी अभियान जैसे सामाजिक मुद्दों पर अभियान से सीएमएम की सफलता का ग्राफ बढ़ता गया। यह काल खंड छत्तीसगढ़ के श्रमिक आंदोलन का स्वर्णिम युग माना जाता है। नियोगी के दिवंगत होने के बाद सीएमएसएस के स्वर्णिम युग की विरासत बचाए रखने में बाद के श्रमिक नेता विफल रहे। ट्रेड यूनियन आंदोलन भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।
समृद्ध पृष्ठभूमि से आने वाले नियोगी ने मजदूर का जीवन आत्मसात किया
14 फरवरी 1943 को असम के नौगांव जिले में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में नियोगी 1960 के दशक के मध्य में भिलाई आ गए। भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करने लगे। भिलाई से ही वे एक ट्रेड यूनियन नेता के रूप में उभरे। जमीनी स्तर के साम्यवादी कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान पूरे देश में होने लगी। नियोगी ने शुरुआत में इस्पात संयंत्र में काम करने वाले सहकर्मियों को कठोर कार्य परिस्थितियों के खिलाफ संगठित करना शुरू किया, जिसके कारण उन्हें निष्कासित कर दिया गया। निष्कासन के बाद वे सीएमएसएसएस के नेता बन गए। वे अविभाजित सीपीआई के सदस्य थे और 1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन के बाद सीपीआई-एम में शामिल हो गए।
नियोगी नक्सलबाड़ी आंदोलन की ओर भी आकर्षित हुए, लेकिन सीपीआई-एमएल के जन संगठनों के बहिष्कार और जन नीति पर उनके रुख की आलोचना के कारण उन्हें नवगठित संगठन से निष्कासित कर दिया गया। पुलिस द्वारा ‘नक्सलीÓ करार दिए जाने के बाद, नियोगी भूमिगत हो गए। वे शंकर के छद्म नाम से रहने लगे। याद रहे, उनका मूल नाम धीरेश था। आपातकाल के तुरंत बाद मीसा लागू होने पर वे बचने के लिए भूमिगत रहकर छत्तीसगढ़ के कस्बों और गांवों में घूमते हुए जीवन व्यतीत करते रहे। बस्तर, गढ़चिरोली और दुर्ग के आदिवासियों के बीच रहे। एक उच्च शिक्षित और समृद्ध पृष्ठभूमि से आने वाले बंगाली नियोगी ने मार्क्सवादी दृष्टिकोण से खुद दिहाड़ी मजदूर और कृषि श्रमिक के रूप में काम किया। जंगलों में मजदूरी की। बाद में 1977 में वे दल्ली-राजहारा चले गए।
यहीं से उनकी सबसे उल्लेखनीय यात्रा शुरू हुई। इस ट्रेड यूनियन में मुख्य रूप से आदिवासी दिहाड़ी मजदूर शामिल थे, जिनमें नियोगी सचिव और ट्रक चालक सहदेव साहू अध्यक्ष थे। सीएमएसएस में पर्यावरण और स्वास्थ्य सहित अठारह विभाग थे।
संगठन की गतिविधियां खनिकों और ग्रामीणों के आर्थिक संघर्षों तक सीमित नहीं रही। नियोगी ने ट्रेड यूनियन को स्थानीय समाज के लगभग हर पहलू से जोड़ा। सीएमएसएसएस ने कई उल्लेखनीय अभियान चलाए।
श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिये ताकतवर संगठन बनाने के साथ ही यूनियन ने स्वास्थ्य सेवा के लिए भी अभियान चलाया और 50 बिस्तरों वाला अस्पताल बनवाया। श्रमिकों की शिक्षा के लिए छह स्कूल बनवाए। पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने अभियान चलाया। शराब विरोधी अभियान चलाया। नियोगी ने दानीटोला में एक श्रमिक विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना भी बनाई थी, लेकिन 28 सितंबर 1991 में उनकी असामयिक मृत्यु के कारण यह सपना साकार नहीं हो सका। करिश्माई नेता की मृत्यु के बाद यह आंदोलन सिमटने लगा। अब छत्तीसगढ़ में श्रमिक आंदोलन काफी कमजोर हो चुका है।
