सुप्रीम कोर्ट से कुछ सवाल

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कनक तिवारी
क्रमांक-6

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले अमेरिकी बाजारवाद से अछूते नहीं हैं। फिर भी अमेरिकी संविधान में वर्णित आजादी की अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की व्याख्यायित संभावनाओं से संपृक्त भी नहीं। क्या यह घालमेल भारतीय संविधान का भविष्य है? ऐसे निर्णयों के भीतर एक अंतर्निहित खतरा और गहराता जा रहा है। अपनी न्याय नजीरों में खुद को स्थापित करते हमारे न्यायाधीश अवतारवाद की मिथक कथा से प्रभावित नजर आते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले कई बार एक दूसरे को उलटते पलटते और खंगालते हैं। एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने अपनी तल्खी में झल्लाकर कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को बुनियादी मसलों पर तो अपनी राय इस तरह कायम करनी चाहिए कि उसे बार बार परिवर्तित करने की जरूरत नहीं पड़े। विधायिका औसतन प्रतिवर्ष डेढ़ बार संविधान में संशोधन करने पर आमादा होती गई है। जस्टिस कृष्ण अय्यर पुन: कहते हैं कि न्यायाधीशों को यह मालूम होना चाहिए कि उन पर संविधान की पोथी का बोझ लदा हुआ है। वे संविधान पर लदे हुए नहीं हैं। जब पहली अदालत आखिरी हो या आखिरी अदालत पहली, तब उसका किया गया फैसला पुनर्विचार के दायरे के बावजूद ऐतिहासिक प्रकृति का होता है। यह तथ्य सुप्रीम कोर्ट को प्रत्येक क्षण याद रखना होता है। एक गरीब मुल्क के पक्षकार इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंच पाते। चारों धाम हिन्दुओं के लिए पवित्रतम मंजिलें हैं, लेकिन उनकी यात्रा एक दुष्कर असाध्य है। न्याय भी पुण्य की तरह वह दूधिया चांदनी है जिसे देखते देखते आंखें भले पथरा जाएं, वह अहसास से आगे बढ़कर अनुतोष के यथार्थ की तरह बरस नहीं पाता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले अपनी गमक में कभी कभी मगरूर भी दिखाई पड़ते हैं। उन्हें इस धरती का नमक बनने की ताब भी दिखानी चाहिए। यह इतिहास का कठिन सवाल है।
यह सुप्रीम कोर्ट को पुनर्विचार करना होगा कि अनुच्छेद 32 में परिभाषित मूलभूत अधिकारों की स्थापना से सत्ता प्रतिष्ठान क्यों कर बच जाता है। यह संसद को भी विचार करना होगा कि वह संविधान संशोधन के जरिए संविधान सभा के निर्माताओं के स्वप्न को मौजूदा पीढिय़ों का समर्थन दे। यह भी देखे कि देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को खण्डित करने की कोशिशों को व्याख्या की पगडण्डियों पर उतारकर जनपथ का महत्व ही कुण्ठित क्यों कर दिया जाता है। न्यायमूर्ति ठक्कर और वेंकटरमैय्या ने ठीक ही इस मनोवृत्ति पर कटाक्ष किया है कि नागरिकों को यह समझाया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों का अंबार लगा होने के कारण उन्हें संवैधानिक मामलों को पहले उच्च न्यायालयों में ले जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीश ऐसी याचिकाओं के उच्च न्यायालय में निपटाए जाने की समझाइश देते नजर आते हैं। यह सलाह तो संविधान के मूलभूत पाठ में क्षेपक जोडऩे की तरह है। परम्परावादी न्यायपालिका यह भी कहती है कि यदि हमारे हाईकोर्ट के न्यायाधीश इतने बुद्धि सक्षम हैं कि वे मूलभूत अधिकारों संबंधी याचिकाओं का मुनासिब निपटारा कर सकते हैं, तो उच्चतम न्यायालय को दखल देने की क्या जरूरत है। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की यह कठिनाई, प्रशंसा या आलोचना संविधान की आयतों की पवित्रता को कम नहीं कर सकती। क्या उच्च न्यायालयों में मुकदमों का ज्यादा बड़ा अंबार नहीं है? उनके इजलास में पड़ी फाइलें लोगों की व्यथा के चीखते अजायबघर हैं। सुप्रीम कोर्ट की पारंपरिक समझ यह क्यों कहती है कि क्रांति होनी तो चाहिए लेकिन पड़ोसी के घर अर्थात हाईकोर्ट से। विकल्प में यह भी तर्क है कि यदि मूलभूत अधिकारों के हनन के सभी प्रकरण उच्च न्यायालयों द्वारा एकबारगी निपटाए जा सकते हैं, तो तत्संबंधी क्षेत्राधिकार सुप्रीम कोर्ट में रखने की जरूरत ही क्या है।

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