Editorial: संसद के बजट सत्र में ही नारी वंदन अधिनियम में एक बार फिर संसोधन होने की अटकलें लगाई जा रही है। यदि ऐसा हुआ तो 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व ही महिलाओं की बल्ले बल्ले हो जाएगी और उन्हें लोकसभा तथा देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिल जाएगा। गौरतलब है कि 2023 में सरकार ने नारी वंदन अधिनियम के नाम से महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा था जो सर्वसम्मति से पारित हो गया था। यही नहीं बल्कि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने तो इस महिला आरक्षण विधेयक को कानून का रूप देकर तत्काल लागू करने की पूर्जोर मांग भी उठाई थी।
उल्लेखनीय है कि इस महिला आरक्षण कानून में यह प्रावधान किया गया था कि इसे जनगणना पूरी होने के बाद और लोकसभा सीटों का नये सिरे से परिसीमन करने के बाद लागू किया जाएगा। इस प्रावधान के चलते ही महिला आरक्षण और लंबे समय तक टलने की संभावना बन गई थी। भारत में जनगणना का काम ही पिछले पांच सालों से टलता रहा है लेकिन अब इसके प्रक्रिया प्रारंभ की जा रही है और 2027 तक जनगणना का काम पूरा होने की उम्मीद की जा रही है। किन्तु परिसीमन का काम और लंबी अवधि तक चल सकता है क्योंकि अभी तक परिसीमन आयोग का गठन ही नहीं किया गया है। ऐसे में परिसीमन की जटिल प्रक्रिया को पूरा होने में चार पांच साल से भी अधिक का समय लग सकता है।
जाहिर है इस स्थिति में 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण के लाभ से वंचित होना पड़ेगा और उन्हें पांच साल और इसका इंतेजार करना पड़ेगा। अब सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव में आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं को अपने पक्ष में करने के लिए 2029 से पहले ही महिला आरक्षण कानून को लागू करने का मन बना लिया है जो शुभ संकेत है। सरकार ने इसकी कवायद भी शुरू कर दी है।
विपक्षी पार्टियों के साथ उसने चर्चा भी शुरू कर दी है ताकि बजट सत्र में ही महिला आरक्षण कानून में एक बार फिर संसोधन किया जाये और इससे लोकसभा सीटों से परिसीमन का प्रावधान हटाया जाये। यदि सरकार इसमें सफल हो जाती है और विपक्षी पार्टियां भी अपनी सहमति जता देती है तो निश्चित रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव में 1 तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी और उसके बाद होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिल जाएगा। गौरतलब है कि महिला आरक्षण विधेयक दशकों से संसद में लटका हुआ था।
इसके पारित कराने में न तो तात्कालीन सरकारों ने दिलचस्पी दिखाई थी और न ही विपक्षी पार्टियां इसके लिए सहमत हुई थी। खासतौर पर क्षेत्रीय पार्टियां तो महिला आरक्षण विधेयक के सख्त खिलाफ रही हैं। यही वजह है कि महिला आरक्षण विधेयक लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। बहरहाल 2023 में एनडीए की सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को लेकर गंभीरता दिखाई और पहली बार तमाम विपक्षी पार्टियां भी इससे सहमत हो गई किन्तु जनगणना और परिसीमन की बाध्यता के चलते महिला आरक्षण कानून की राह में रोड़ा आ गया था अब उसे हटाने की तैयारी की जा रही है जो स्वागत योग्य कदम है।
वर्तमान में लोकसभा में सिर्फ 74 महिला सांसद हैं जो महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद बढ़कर 179 हो जाएगा। जब इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं देश की संसद में पहुंचेंगी तो महिलाओं के हित में और ज्यादा प्रभावी कानून बनने लगेंगे। इसी तरह देश की विभिन्न विधानसभाओं में सिर्फ 390 महिला विधायक हैं जिनकी संख्या महिला आरक्षण कानून लागू होने से बढ़कर 1360 हो जाएगी।
जाहिर है ऐसा होने पर ही सही मायने में महिला सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा और आधी आबादी को पूरा नहीं तो एक तिहाई हक तो मिल ही जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए की संसद के इस बजट सत्र में महिला आरक्षण कानून मे आवश्यक संसोधन हो जाएगा। बशर्ते सत्ता पक्ष और विपक्ष नूरा कूसती बंद करके इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपना ध्यान केन्द्रित करे और महिला आरक्षण कानून को संसोधित कर तत्काल लागू करें।
