Tokyo Olympic Games : आयरन लेडी बनकर उभरी चानू

Tokyo Olympic Games : आयरन लेडी बनकर उभरी चानू

Tokyo Olympic Games: Chanu emerges as Iron Lady

Tokyo Olympic Games

Tokyo Olympic Games : टोक्यो में 23 जुलाई से शुरू हुए ओलम्पिक खेलों में पहले ही दिन भारतीय महिला खिलाड़ी मीराबाई चानू द्वारा देश के लिए पहला पदक जीतना हर भारतीय के लिए बेहद गौरवान्वित करने वाला पल था और अब पीवी सिंधु ने इस खुशी को दोगुना कर दिया है। वैसे ओलम्पिक खेलों में भारत के लिए मीराबाई चानू की जीत से अच्छी शुरुआत नहीं हो सकती थी।

हालांकि 2016 के रियो ओलम्पिक में हार के बाद चानू को गहरा सदमा लगा था और उस हार के बाद वह इस कदर टूट गई थी कि उन्हें लगने लगा था कि ओलम्पिक में उनका सफर वहीं खत्म हो गया है लेकिन इस हताशा से उबरने के बाद चानू बुलंद हौंसलों के साथ ऐसी ‘आयरन लेडी’ बनकर उभरी कि भारोत्तोलन में उन्होंने न केवल भारत का 21 वर्ष का सूखा खत्म किया बल्कि ओलम्पिक में भारोत्तोलन में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी भी बनी।

चानू के बुलंद हौंसलों का ही प्रतिफल है कि उसी की बदौलत ओलम्पिक खेलों के पहले ही दिन टोक्यो में पोडियम में भारतीय तिरंगा शान से लहराया। हालांकि रियो ओलम्पिक में हार का सामना करने के बाद चानू मंच से रोती हुई गई थी लेकिन टोक्यो ओलम्पिक के लिए उनके बुलंद हौंसलों का परिचय तभी मिल गया था, जब उन्होंने ओलम्पिक की तैयारी के दौरान कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर अपनी एक पोस्ट में लिखा था, ”मेहनत लगती है, चोट भी लगती है, असफलता का अनुभव होता है….लेकिन सफलता की राह कभी भी किसी के लिए आसान नहीं होती!”

भारत के लिए मणिपुर की 26 वर्षीया स्टार वेट लिफ्टर मीराबाई चानू (Tokyo Olympic Games) की यह जीत इसलिए भी बहुत बड़ी उपलब्धि रही क्योंकि आधुनिक ओलम्पिक खेलों के 121 वर्षों के सफर में भारत का यह केवल 17वां व्यक्तिगत पदक था। व्यक्तिगत स्पर्धा में भी नॉर्मन पिचार्ड, राज्यवर्धन सिंह राठौर, सुशील कुमार, विजय कुमार और पीवी सिंधु के बाद ओलम्पिक में भारत का यह छठा रजत पदक ही है। चानू पीवी सिंधू के बाद दूसरी ऐसी भारतीय महिला खिलाड़ी हैं, जिसने ओलम्पिक के अब तक के इतिहास में रजत पदक जीता है।

भारत के लिए चानू की यह जीत इसलिए भी गौरवान्वित करने वाली है क्योंकि इससे पहले भारत ओलम्पिक खेलों में पहले दिन कभी कोई पदक जीतने में सफल नहीं हुआ। चानू की ऐतिहासिक जीत के बाद भारत पदक तालिका में दूसरे स्थान पर पहुंच गया, यह उपलब्धि भी देश को इससे पहले कभी हासिल नहीं हुई।

2004 के एथेंस ओलम्पिक में अभिनव बिंद्रा ने तीन दिन बाद शूटिंग में स्वर्ण पदक जीता था, 2012 के लंदन ओलम्पिक में गगन नारंग ने भी तीन बाद ही शूटिंग में कांस्य पदक जीता था जबकि शूटिंग में राज्यवर्धन सिंह राठौर 2008 के बीजिंग ओलम्पिक में पांचवें दिन, 2016 के रियो ओलम्पिक में पहलवान साक्षी मलिक 12वें दिन, 1996 के अटलांटा ओलम्पिक में टेनिस स्टार लिएंडर पेस 14वें दिन पदक जीतने में सफल हुए थे।

मीराबाई टोक्यो ओलम्पिक (Tokyo Olympic Games) के लिए क्वालीफाई करने वाली एकमात्र भारोत्तोलक हैं, जो रियो ओलम्पिक में क्लीन एवं जर्क में तीन में से एक भी प्रयास में वैलिड वेट नहीं उठा सकी थी लेकिन टोक्यो ओलम्पिक में 49 किलोग्राम भारोत्तोलन स्पर्धा में उसने रजत पदक जीतकर न सिर्फ देश का खाता खोला बल्कि भारोत्तोलन स्पर्धा में देश का 21 साल लंबा इंतजार भी खत्म किया। इससे पहले कर्णम मल्लेश्वरी ने 2000 के सिडनी ओलम्पिक में 69 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीता था जबकि चानू ने ओलम्पिक में क्लीन एवं जर्क में 115 किलोग्राम और स्नैच में 87 किलोग्राम से कुल 202 किलोग्राम वजन उठाकर भारत को भारोत्तोलन स्पर्धा में पहली बार रजत पदक दिलाया।

स्वर्ण पदक कुल 210 किलोग्राम (स्नैच में 94 और क्लीन एवं जर्क में 116 किलोग्राम) से चीन की होऊ झिऊई के नाम रहा। वैसे मीराबाई के नाम महिला 49 किलोग्राम वर्ग में क्लीन एवं जर्क में विश्व रिकॉर्ड भी है। ओलम्पिक में उन्होंने क्लीन एवं जर्क में 115 किलोग्राम वजन उठाया जबकि ओलम्पिक से पहले उन्होंने अपने आखिरी टूर्नामेंट ‘एशियाई चैम्पियनशिप’ में 119 किलोग्राम वजन उठाकर इस वर्ग में स्वर्ण और ओवरऑल वजन में कांस्य पदक जीता था। इस चैम्पियनशिप में यह शानदार प्रदर्शन करने के बाद ही उन्हें टोक्यो ओलम्पिक का टिकट हासिल हुआ था।

8 अगस्त 1994 को मणिपुर के नोंगपेक काकचिंग गांव में जन्मी मीराबाई चानू (Tokyo Olympic Games) हालांकि बचपन में तीरंदाज बनना चाहती थी लेकिन शायद उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, जो उसे वेटलिफ्टिंग की ओर ले गई। दरअसल आठवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक में उसने जब इम्फाल की ही रहने वाली भारत की विख्यात भारोत्तोलक कुंजुरानी देवी के बारे में पढ़ा तो उसने भी उसी की भांति भारोत्तोलक बनने और देश के कुछ विशेष करने का निश्चय किया। उल्लेखनीय है कि कोई भी भारतीय महिला भारोत्तोलक अब तक कुंजुरानी से ज्यादा पदक नहीं जीत सकी है।

जब चानू ने भारोत्तोलक बनने का निश्चय किया, उस समय तक उन्हें ओलम्पिक खेलों के बारे में कुछ नहीं पता था, तब उनका एक ही सपना था कि वह इस खेल में कोई बड़ा सा पदक जीतें। 2007 में जब मीराबाई ने प्रैक्टिस शुरू की तो उनके पास लोहे का बार नहीं था, इसलिए वह तब बांस से ही प्रैक्टिस किया करती थी। चूंकि गांव में कोई ट्रेनिंग सेंटर नहीं था, इसलिए वह 12 साल की उम्र में प्रैक्टिस के लिए ट्रक पर सवार होकर 50-60 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग के लिए जाया करती थी।

हालांकि चानू (Tokyo Olympic Games) का बचपन पहाड़ से जलावन की लकडिय़ां बीनते हुए संघर्षों के दौर से गुजरा लेकिन इन संघर्षों का मजबूती से सामना करते हुए ओलम्पिक विजेता बनकर 4 फुट 11 इंच की छोटे से कद की चानू ने साबित कर दिखाया कि हौंसले बुलंद हों तो मंजिल तक पहुंचना नामुमकिन नहीं होता। मीराबाई 17 साल की उम्र में जूनियर चैम्पियन बन गई थी और जिस कुंजुरानी की बदौलत उन्होंने स्वयं भी भारोत्तेलक बनने का निश्चय किया था, उसी कुंजुरानी के 12 वर्ष पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को उन्होंने 2016 में 192 किलोग्राम वजन उठाकर तोड़ दिया था।

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