शिक्षा और सेवा नियमों के बीच फंसी एक कानूनी जंग में देश की सर्वोच्च अदालत ने छत्तीसगढ़ के एक न्यायालयीन कर्मचारी के पक्ष में अंतरिम आदेश (Supreme Court Interim Order LLB Exam) जारी किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सहायक ग्रेड-III के पद पर कार्यरत कर्मचारी को एलएलबी (LLB) तीसरे वर्ष की परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति दे दी है। यह मामला प्रशासनिक नियमों और करियर की प्रगति के बीच के संघर्ष को दर्शाता है, जिसमें अब न्याय की उम्मीद जगी है।
क्या है पूरा विवाद? नियमों की पेचीदगी में फंसा छात्र (Supreme Court Interim Order LLB Exam)
मामला सितंबर 2022 का है, जब याचिकाकर्ता की नियुक्ति प्रधान जिला एवं सत्र न्यायालय में सहायक ग्रेड-III के रूप में हुई थी। नियुक्ति की शर्तों के मुताबिक, प्रोबेशन अवधि के दौरान उच्च शिक्षा के लिए अनुमति जरूरी थी। कर्मचारी को पहले और दूसरे वर्ष की पढ़ाई के लिए तो अनुमति मिल गई, लेकिन पेंच तब फंसा जब 2023 में नए सेवा नियम (छत्तीसगढ़ जिला न्यायपालिका स्थापना नियम, 2023) लागू हुए।
नियम 11 के तहत सरकारी कर्मचारियों के नियमित छात्र (Regular Student) के रूप में पढ़ाई करने पर रोक लगा दी गई और केवल पत्राचार या प्राइवेट पढ़ाई की अनुमति दी गई। इसी नियम का हवाला देते हुए विभाग ने तीसरे वर्ष की परीक्षा देने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
इस मामले में कानूनी लड़ाई काफी दिलचस्प रही। पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए परीक्षा में बैठने की इजाजत (Supreme Court Interim Order LLB Exam) दी थी। लेकिन, जब यह मामला डिवीजन बेंच के पास पहुंचा, तो वहां सिंगल बेंच के आदेश को पलट दिया गया और अनुमति खारिज कर दी गई।
अंततः, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अंतरिम राहत प्रदान की। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को एलएलबी तीसरे वर्ष की शेष परीक्षाओं में बैठने (Supreme Court Interim Order LLB Exam) दिया जाए। हालांकि, जो एक परीक्षा छूट चुकी है, उस पर फैसला बाद में लिया जाएगा।
