Supreme Court Case Disposal : सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में 75 हजार से अधिक मामलों का निपटारा किया, अमेरिका-ब्रिटेन भी नहीं कर सकते कल्पना
Supreme Court Case Disposal
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा (Supreme Court Case Disposal) कर न्यायिक इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की है। यह आंकड़ा न केवल भारत के लिए, बल्कि वैश्विक न्यायपालिका के संदर्भ में भी असाधारण माना जा रहा है। दुनिया की अन्य सर्वोच्च अदालतें—चाहे अमेरिका हों या ब्रिटेन—इस स्तर की न्यायिक दक्षता की कल्पना भी नहीं कर सकतीं।
यह सही है कि भारत की विशाल जनसंख्या के अनुपात में यह संख्या बहुत बड़ी न लगे, लेकिन जब जनसंख्या और न्यायाधीशों की संख्या के अनुपात की वैश्विक तुलना की जाती है, तो भारत की यह उपलब्धि और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या विश्व में सबसे कम है, इसके बावजूद इतने बड़े पैमाने पर मामलों का निपटारा किया जाना न्यायपालिका की कार्यकुशलता को दर्शाता है।
मीडिएशन को बताया गया प्रभावी समाधान
हाल ही में आयोजित ‘एक्सप्लोरिंग द एफिशिएंसी एंड रीच ऑफ मीडिएशन’ विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुकदमों के बढ़ते बोझ पर चिंता जताते हुए वैकल्पिक समाधान अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मीडिएशन (सुलह-समझौता प्रक्रिया) न्यायिक प्रणाली पर दबाव कम करने का प्रभावी माध्यम हो सकता है।
तुषार मेहता के अनुसार, मीडिएशन में दोनों पक्षों को आपसी सहमति से समाधान निकालने का अवसर मिलता है, जिससे लंबी और पारंपरिक अदालती लड़ाइयों से बचा जा सकता है। देश के अनेक वरिष्ठ कानूनविद् भी इस विचार का समर्थन कर रहे हैं और मानते हैं कि मीडिएशन से न्यायपालिका का बोझ काफी हद तक कम हो सकता है।
अमेरिकी और ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट पीछे
तथ्य बताते हैं कि जहां भारतीय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Case Disposal) ने एक वर्ष में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया, वहीं अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हर साल दर्ज होने वाले हजारों मामलों में से केवल 70 से 80 मामलों पर ही सुनवाई हो पाती है। ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।
ब्रिटेन में वर्ष 2025 में 29 दिसंबर तक सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 200 से कुछ अधिक मामले आए, जिनमें से केवल लगभग 50 मामलों में ही फैसला सुनाया गया। इसके विपरीत, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने करीब 1,400 महत्वपूर्ण निर्णय दिए और हजारों मामलों में आदेश पारित कर निपटारा किया।
जजों की कमी के बावजूद ऐतिहासिक प्रदर्शन
भारत में प्रति 10 लाख की आबादी पर केवल 21 न्यायाधीश हैं, जो दुनिया में सबसे कम है। तुलना करें तो अमेरिका में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 150 न्यायाधीश कार्यरत हैं। विधि आयोग ने वर्ष 1987 की अपनी रिपोर्ट में प्रति 10 लाख की आबादी पर कम से कम 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की थी, जो अमेरिका के मुकाबले भी एक-तिहाई ही है।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Case Disposal) की बात करें तो वर्तमान में वहां न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 है, जिसे वर्ष 2019 में बढ़ाया गया था। यदि देश की आबादी लगभग 150 करोड़ मानी जाए, तो औसतन 4.5 करोड़ लोगों पर सुप्रीम कोर्ट में केवल एक न्यायाधीश है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने जिस स्तर पर मामलों का निपटारा किया है, वह वैश्विक न्यायपालिका के लिए एक मिसाल बन गया है।
जजों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ भी स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि न्यायपालिका को और अधिक न्यायाधीशों की आवश्यकता है। उनके शब्दों में, “हमें सीधे-सीधे ज्यादा जजों की जरूरत है। हम सरकार के साथ लगातार संपर्क में हैं, ताकि सभी स्तरों पर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जा सके।”
कुल मिलाकर, सीमित संसाधनों और न्यायाधीशों की भारी कमी के बावजूद भारतीय सुप्रीम कोर्ट का यह प्रदर्शन न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि वैश्विक न्याय व्यवस्था के लिए प्रेरणास्रोत भी बन गया है।
