यशवंत धोटे
रायपुर/नवप्रदेश। Chhattisgarh Politics: नवप्रदेश छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्ष में पहुंचने तक राज्य के आवाम ने क्या खोया और क्या पाया? कितनी बदली आबोहवा राज्य के आवाम के मिजाज की? इन मसलों को लेकर दैनिक नवप्रदेश पिछले एक सप्ताह से छत्तीसगढ़ की सामाजिक राजनीति की अनेक विधाओं को लेकर विश्लेषण कर रहा है। दरअसल सामाजिक राजनीति की विधा इतनी व्यापक है कि इसकी जटिलता को समझने के लिए जातीय जनगणना की परिकल्पना के जनक राजनीतिक दलों के थिंक टैंकों को भी दूसरा जन्म लेना पड़ सकता है। इसे दो, चार, पांच एपीसोड में नहीं समेटा जा सकता। फिर भी नवप्रदेश ने एक कोशिश की है कि पिछले 25 साल में राज्य की इस राजनीति के कारण आए बदलाओं को लिखा जाए।
अब तक हमने राज्य में यादव राजनीति, साहू राजनीति, आदिवासी राजनीति, सवर्ण राजनीति च्च्बाईच्च् राजनीति (ब्राहम्ण, यादव समीकरण, दरअसल यह समीकरण साहू, कुर्मी राजनीति को काउन्टर करने के लिए बना है) पर प्रकाश डाला है। नवप्रदेश के सुधि पाठक हमारे इस प्रयास को खूब पसन्द कर रहे हंै। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के अधकचरे ज्ञान के बीच हमारा यह तार्किक और अनुभवशील प्रयास पत्रकारिता और राजनीति की नई पीढ़ी के लिए ज्ञानवर्धक हो इस बात का ध्यान रखने की कोशिश है। इसी कड़ी में आज हम बात कर रहे है छत्तीसगढ़ की पुत्र राजनीति की। इस राजनीति को जीने वाले राजनीतिक दलों और उनके वरिष्ठ राजनीतिज्ञों ने अपने सार्वजनिक जीवन में क्या खोया और क्या पाया, इस पर बात करने का प्रयास है।
हम शुरूआत करते है नवप्रदेश छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी से। अमित जोगी फिलहाल राजनीति के बियाबान में भटक रहे हैं। सचमुच समय बड़ा बलवान होता है। कभी पुत्र के नाम से पिता तो कभी पिता के नाम से पुत्र को जाना जाता है। वर्ष 2000 में बतौर मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मनोनयन के बाद अमित जोगी के सत्ता प्रतिष्ठान में दखल को लेकर उस समय के प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने हायतौबा मचा रखी थी। अमित की मित्रमंडली और कुछ ब्यूरोक्रेट्स ने मिलकर नए राज्य की राजनीतिक और सामाजिक फिजा को कुछ ऐसे बदला कि अविभाजित मध्यप्रदेश में जीवन जी रहे अमीर धरती के गरीब लोग कुछ ठगा सा महसूस करने लगे थे।
मात्र तीन साल के कार्यकाल में एनसीपी नेता रामअवतार जग्गी की हत्या से लेकर आदिवासी नेताओं के चेहरे पर कालिख पोतने तक की घटनाओं नें मुख्यमंत्री अजीत जोगी की छबि और सार्वजनिक जीवन की शुचिता को इतना डेन्ट किया कि तीन साल में ही कांग्रेस की सरकार चली गई। हालांकि स्वयं पर लगे हत्या के आरोप के बाद अमित ने न केवल कानून की पढ़ाई की बल्कि अपना केस भी लड़ा और बरी हुए। चुनाव लड़ा विधायक बने, पिता द्वारा गठित राजनीतिक दल का संचालन किया। लेकिन समय के साथ हुए राजनीतिक अवसान ने अमित को राजनीति के बियाबान में लाकर खड़ा कर दिया। पुत्र राजनीति के इस दौर ने कांग्रेस को 15 साल सत्ता से बाहर रखा बल्कि उनके पिता को भी कांग्रेस की राजनीति से बाहर होना पड़ा। तीन साल में अजीत जोगी ने राज्य के लिए जो अच्छे काम किए वो पुत्र राजनीति की ओंट में छिप गए।
2004 में राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने डॉ. रमन सिंह ने राज्य पर 15 साल राज किया। इस दरम्यान उनके पुत्र अभिषेक सिंह राजनांदगांव से सांसद बने तब तक उन पर कोई आरोप नहीं थे, लेकिन 2018 के चुनाव से पहले आक्रामक हुई कांग्रेस ने पनामा पेपर में अभिषेक के नाम आने का आरोप लगा कर ठीक वैसे ही हायतौबा की जैसे 2003 में अमित वाले मामले में भाजपा ने की थी। डॉ. रमन सिंह को पुत्र राजनीति का कोई व्यक्तिगत नुकसान तो नहीं हुआ लेकिन 2018 के चुनाव में 15 साल की सत्ता विरोधी लहर ने भाजपा को 50 से 15 पर समेट दिया और 2019 के लोकसभा चुनाव में अभिषेक को टिकिट से वंंिचत होना पड़ा। लेकिन 2018 से 23 तक पार्टी के लिए डॉ. रमन सिंह का संघर्ष जारी रहा और 2023 में भाजपा ने धमाकेदार वापसी की। डॉ. रमन सिंह आज भी केन्द्र और राज्य की सत्ता, संगठन के बीच महत्वपूर्ण सेतु का काम कर रहे हैं बतौर विधानसभा अध्यक्ष राज्य की राजनीतिक शुचिता को बनाए रखने की कोशिश कर रहे है। और अभिषेक अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र में जनता के बीच सक्रिय है।
कांग्रेस के पहले निर्वाचित और राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के 2018 में शपथ लेने तक उनके पुत्र चैतन्य बघेल को कोई नहीं जानता था। लेकिन राजनीति में पुत्र राजनीति जो करवा दे वो कम है। पहले ढाई-ढाई साल के कार्यकाल को लेकर पार्टी के अन्दर घिरे, भूपेश बघेल 2023 का चुनाव आते तक भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गए। उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस संगठन को रिचार्ज कर 15 साल की भाजपाई सत्ता को उखाड़ फेंकने का उनका पराक्रम और पुरूषार्थ पार्टी के लिए भले ही वरदान साबित हुआ हो लेकिन खुद के लिए अभिशाप ही माना जाएगा। पांच साल राज करने के बावजूद बम्पर जनादेश की सत्ता चली गई। सत्ता जाने के राजनीतिक नफे नुकसान से इतर बेटे का जेल जाना बड़ा व्यक्तिगत, पारिवारिक नुकसान हुआ।
दरअसल पिता के मुख्यमंत्री बनने के बाद चैतन्य की बनी नई मित्र मंडली का सत्ता प्रतिष्ठान में वैसे हस्तक्षेप नहीं था जैसे अमित जोगी का था। लेकिन जांच एजेंसियों की कार्रवाई के फलस्वरूप मामला न्यायालय में है और चैतन्य जेल में है इसलिए इस पर ज्यादा कुछ लिखा जाना ठीक नहीं है। राजनीतिक नफे नुकसान की परवाह से इतर भूपेश बघेल संगठन में अब अपने वर्चस्व की लड़ाई भी लड़ रहे है। अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मोतीलाल वोरा के पुत्र अरूण वोरा को बार-बार टिकिट देने और उनके हार जाने के कारण शंकरलाल ताम्रकार नामक एक कांग्रेस नेता ने सार्वजनिक तौर पर उन्हें धृतराष्ट्र कह दिया था। नतीजा यह रहा कि अरूण 6 में से तीन चुनाव हारे।