2,944 पद खाली, 38 स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे
जयदेव सिंह
महासमुंद/नवप्रदेश। (shortage of teachers in government schools ) शिक्षा को विकास की सबसे मजबूत नींव माना जाता है, लेकिन महासमुंद जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर शासन-प्रशासन के दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। जिले के सरकारी स्कूलों में हजारों शिक्षकीय पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं, जबकि बड़ी संख्या में कार्यरत शिक्षकों को भी पढ़ाई के बजाय विभिन्न विभागों और प्रशासनिक कार्यों में लगाया गया है।
परिणाम स्वरूप लाखों गरीब और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है। स्थिति इतनी गंभीर है कि जिले के 38 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां पूरे विद्यालय का संचालन केवल एक शिक्षक के भरोसे हो रहा है। वहीं हजारों पद रिक्त होने के कारण कई स्कूलों में विषय विशेषज्ञ शिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं। शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सरकारी दावों के बीच यह स्थिति सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
सरकारी स्कूल कमजोर निजी स्कूल मजबूत
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में लगातार बढ़ती शिक्षक कमी और शैक्षणिक अव्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ निजी स्कूलों को मिल रहा है। ग्रामीण और गरीब परिवार भी मजबूरी में निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। परिणामस्वरूप निजी स्कूलों की संख्या और उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, जबकि सरकारी स्कूलों की साख कमजोर होती जा रही है।
1.41 लाख विद्यार्थियों पर महज 6,579 शिक्षक
यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यू-डाइस) के वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार महासमुंद जिले में प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी स्तर तक कुल 1 लाख 41 हजार 503 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।
प्रधान पाठकों और प्राचार्यों के पदों पर सबसे ज्यादा संकट
मिडिल स्कूलों में प्रधान पाठकों की स्थिति बेहद खराब है।
स्वीकृत पद : 489
कार्यरत : 107
रिक्त : 382
यानी लगभग 78 प्रतिशत
पद खाली हैं।
प्राचार्यों के लिए
स्वीकृत पद : 186
कार्यरत : 79
रिक्त : 107
अर्थात आधे से अधिक स्कूल बिना नियमित प्राचार्य के संचालित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब विद्यालयों में नेतृत्वकारी पद ही खाली रहेंगे तो शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होना स्वाभाविक है।
व्याख्याता और विज्ञान शिक्षकों की भारी कमी
हायर सेकेंडरी स्तर पर पढ़ाई की गुणवत्ता के लिए व्याख्याताओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन यहां भी स्थिति चिंताजनक है।
व्याख्याता के स्वीकृत पद : 2,021
सीधी भर्ती से कार्यरत : 574
पदोन्नति से कार्यरत : 794
कुल मिलाकर सैकड़ों पद अब भी रिक्त हैं।
गैर शिक्षकीय कार्य
में शिक्षक की ड्यूटी
2 शिक्षक समग्र शिक्षा में
2 राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान में
5 बीआरसी कार्यालय में
6 नवकीरण अकादमी में
2 विकासखंड शिक्षा अधिकारी के रूप में
31 आदिम जाति कल्याण विभाग के छात्रावासों में
कार्यरत हैं।
इसके अलावा दो दर्जन से अधिक शिक्षकों को संकुल समन्वयक की जिम्मेदारी
दी गई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब स्कूलों में शिक्षक पहले से कम हैं तो उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने की अनुमति आखिर क्यों दी जा रही है?
38 स्कूलों में अकेला शिक्षक संभाल रहा पूरी व्यवस्था
शिक्षा विभाग की सबसे चौंकाने वाली तस्वीर उन 38 स्कूलों की है जहां केवल एक शिक्षक पदस्थ है।
इतनी समस्या तो कैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
पढ़ाई करानी
उपस्थिति दर्ज करनी,
शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन करना,
विभागीय रिपोर्ट तैयार करना,
परीक्षा संचालन करना, जैसे तमाम कार्य करने पड़ते हैं।
ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना भी मुश्किल है।
दूसरे कामों की वजह से शिक्षण व्यवस्था प्रभावित
सहायक शिक्षक विज्ञान के 412 पद स्वीकृत हैं।
बड़ी संख्या में पद आज भी खाली हैं।
विज्ञान और गणित जैसे विषयों में शिक्षकों की कमी का सीधा असर विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी पर पड़ रहा है।
पढ़ाने की जगह दूसरे कामों में लगे शिक्षक
शिक्षकों की कमी के बीच जो शिक्षक उपलब्ध हैं, उनमें से भी कई शिक्षण कार्य नहीं कर पा रहे हैं।
जिले में कम से कम 49 शिक्षक विभिन्न विभागों और कार्यालयों में संलग्न (अटैच) हैं।
